Friday, February 27, 2009

लंबी रेस के घोड़े दौड़ते हैं इक्विटी के ट्रैक पर

जनवरी 2008 तक शेयर बाजार में पैसा लगाने वाले ज्यादातर लोग मुनाफे में चल रहे थे। लेकिन मंदी ने जब दुनिया को अपने आगोश में लिया तो शेयर बाजार का भी दम निकल गया। बीते कुछ साल के दौरान बाजार में दर्ज की गई तेजी ने अगर छोटे निवेशकों को इक्विटी से जुड़ी चिंता दरकिनार करने के लिए प्रोत्साहित किया था तो उसके बाद शेयर मार्केट में आई भारी गिरावट ने उन्हें सोने और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे पारंपरिक सुरक्षित विकल्पों की शरण में जाने के लिए मजबूर कर दिया है। बाजार के मौजूदा हालात की वजह से निवेशक इक्विटी से दूरी बनाए रखने में अपनी बेहतरी समझ रहे हैं। वे इस बात से खौफजदा हैं कि पहले ही नुकसान उठाने के बाद आगे पैसा लगाने से कहीं उन्हें और घाटा न हो जाए। हालांकि, छोटी अवधि का यह दृष्टिकोण उस वक्त हानिकारक साबित हो सकता है, जब आप लंबी अवधि के लिए निवेश कर रहे हों। जैसे कि रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी के लिए रकम एकत्र करना। ऐसे उद्देश्यों तक पहुंचने के लिए निवेशक को कम से कम 15 से 20 साल की निवेश अवधि लेकर चलने की जरूरत पड़ती है। बाजार के जानकारों का मानना है कि जिन लोगों की निवेश की अवधि इतनी लंबी है, उन्हें इक्विटी से परे देखने की आवश्यकता ही नहीं है क्योंकि पैसा जोड़ने के लिए शेयर बाजार सबसे बढ़िया जरिया है। लेकिन इसके लिए निवेश की रणनीति संतुलित और लंबी मियाद के लिए होनी चाहिए। आईडीएफसी म्यूचुअल फंड की ओर से मुहैया कराए गए आंकड़ों के मुताबिक, शीर्ष वरीयता प्राप्त डायवर्सिफाइड इक्विटी फंड ने 15 साल की अवधि के दौरान प्रदर्शन के मामले में दूसरी एसेट श्रेणियों को काफी पीछे छोड़ दिया। जनवरी 1994 से जनवरी 2009 के बीच इन फंडों ने सोने के 6.09 फीसदी, फिक्स्ड डिपॉजिट के 8.64 फीसदी और रियल एस्टेट के 9.97 फीसदी की तुलना में 14.22 फीसदी रिटर्न दिया। आईडीएफसी म्यूचुअल फंड के प्रबंध निदेशक नवल बीर कुमार ने कहा, 'लंबी अवधि में इक्विटी ने हमेशा से दूसरे निवेश विकल्पों की तुलना में ज्यादा रिटर्न दिया है।' बिड़ला सनलाइफ म्यूचुअल फंड में सह-प्रमुख (इक्विटी) अजय अर्गल ने कहा, 'ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि 1979 से अगर किसी निवेशक ने किसी भी कारोबारी साल की शुरुआत में सेंसेक्स में निवेश किया और उसे कम से कम 12 साल तक बरकरार रहने दिया है तो उसने कभी पैसा नहीं गंवाया।' इसके अलावा इक्विटी में कर छूट का फायदा भी मिलता है और पारदर्शिता का स्तर काफी ऊंचा होता है क्योंकि वैल्यूएशन लगभग हर रोज बताई जाती है।
इक्विटी बनाम सावधि जमा
फिक्स्ड डिपॉजिट या सावधि जमा के मामले में रिटर्न और मूल पूंजी को लेकर कोई चिंता नहीं होती लेकिन इससे मिलने वाला रिटर्न, महंगाई दर को पीछे छोड़ने में कामयाब नहीं रहता। फाइनेंशियल प्लानर गौरव मशरूवाला ने कहा, 'तर्क के आधार पर देखें तो भी इक्विटी को एफडी से बेहतर प्रदर्शन करना चाहिए। आखिरकार, आपकी तरफ से एफडी में लगाया जाने वाला पैसा बैंक उद्यमियों को कर्ज देते हैं, जो अपने मुनाफे में से लोन चुकाते हैं। कोई भी कंपनी मुनाफे से ज्यादा ऊंची दर पर ब्याज नहीं चुकाती जिसका यह मतलब हुआ कि अगर आप सीधे कारोबार में निवेश करते हैं (यानी किसी कंपनी के शेयर खरीदते हैं) तो आपको बेहतर मुनाफा मिलना तय है।'
इक्विटी बनाम सोना
जब बात सुरक्षित और निरंतर रिटर्न की आती है तो इक्विटी भी सोने की चमक से छिप नहीं सकता। लेकिन नकदी के मामले में इक्विटी, सोने से ज्यादा मजबूत दिखता है। बार और सिक्कों के बजाय ज्यादातर भारतीय गहनों के रूप में सोने में पैसा लगाने को तरजीह देते हैं, ऐसे में वे सोना रखने को लेकर भावनात्मक लगाव रखते हैं और इसलिए वे इससे अलग भी नहीं होना चाहते।
इक्विटी बनाम रियल एस्टेट
रियल एस्टेट, निवेशकों को सिर छिपाने और मूल्य में बढ़ोतरी के तौर पर दोहरा फायदा मुहैया कराता है। मशरूवाला ने कहा, 'हालांकि भारत में भौतिक रूप से प्रॉपर्टी खरीदना आसान नहीं है क्योंकि अफोर्डेबिलिटी एक बड़ा अवरोध है।' इसके अलावा तुलनात्मक रूप से रियल एस्टेट कम तरल एसेट श्रेणी है जबकि इक्विटी में खरीद और बिक्री से जुड़े सौदे करना काफी आसान होता है। अगर आप रिटायरमेंट के बाद की जरूरतों को पूरा करने की इक्विटी की क्षमता पर भरोसा रखते हैं, तो उसमें निवेश करने पर विचार कर सकते हैं। लेकिन आपको मन-मुताबिक फायदा हासिल करने के लिए इक्विटी में लंबा निवेश करने की जरूरत को भी पहचान लेना चाहिए।
-प्रीति कुलकर्णी