Tuesday, September 30, 2008

What I learnt from Rakesh Jhunjhunwala- Hemal Shah

INDIA'S answer to Warren Buffet. The stock market’s ‘big bull’. The pin up boy of the markets: Rakesh Jhunjhunwala.He made a fortune by investing in the stock market. From an initial amount of Rs 5,000, as it is rumoured, he has made Rs 5,000 crore in just over two decades!Jhunjhunwala once said humorously, "Markets are like women; always commanding, mysterious, unpredictable and volatile." And yet he lorded them. There is a lot I learnt from his investing quotes, and there's something in it for you too. --
Invest in a business and not a company.
Jhunjhunwala identified and invested in Pantaloons much before the market discovered it. Today, he is gaining from that investment. That's because he invested in the potential of the underlying business (of organized retail in this case) and it's first mover advantage.--
Maximise profits and minimise losses.
Cut losses and move on with life. At the same time, hold on to winning stocks till their business has achieved its full potential.--
Always have an independent opinion.
Observe and read relevant information with an open mind.Jhunjhunwala believes in doing his own research before investing. A good example: he was lapping up the ignored Indian Public Sector (PSU) stocks when the herd was after the IT stocks during the late nineties. He made a fortune investing in PSU stocks, while many lost their shirts during the dot com led market crash in 2000.
-- Be opportunistic but wait for the right moment.
Don't jump to buy all at once. The market always gives a chance to buy more at a lesser price if you wait for the right moment.
-- Be happy with your gains but learn to accept losses with a smile.
Jhunjhunwala has had his share of dud investments. A good example is Mid-day Multimedia. But that did not deter him.
-- Study the markets thoroughly. Refer to history.
There have been many a bull and bear markets but in the long-term, the market is always trending upwards
-- Do something you love.
Jhunjhunwala went on to pursue his passion for investing right after he completed his Chartered Accountacy. He also had the option to go abroad but he chose to do what he loved.
-- Patience may be tested but your conviction will be rewarded.
Many of his holdings like Praj Industries, Hindustan Oil Exploration, Pantaloon, did not move for quite some time. However, he had the conviction in their business models and their potential to become multibaggers, which they eventually did.
Market is always right. Markets cannot be taught, they have to be learnt.
According to him there are no kings or kingdoms in the stock market. Mr Market is the only prime force.
-- Be an optimist!
I feel his genuine optimism rubs across the businesses he backs and they achieve success faster. For example: Bilcare, a clinical supplies management services, has suddenly become a hot story out of nowhere.
-- Aspire, but never envy.
Jhunjhunwala believes in sharing his investment ideology and thought process in this highly secretive industry.
-- Begin whatever you dream. Boldness has genius, power and magic in it.
No wonder he has backed many a first generation entrepreneurs like C.J. George (Geojit Financial), Mohan Bhandari ( Bilcare), Pramod Chaudhari (Praj Industries) etc.And some more...
-- Build a fighting spirit; take the bad with the good.
-- Balance Fear and Greed
-- Invest for the long term
-- Be paranoid of success; never take it for granted. Realise success can be temporary and transient
Recently, while addressing an audience in Hyderabad, he predicted that the bull market is intact and the current phase is just a significant time-wise and price-wise correction. Let's hope he is right this time around too and we see the resurgence of the India bull market soon.

Thursday, September 18, 2008

गिरावट के दौर में एसआईपी के जरिए निवेश बेहतर

कई निवेशक उलझन में हैं कि मौजूदा समय में शेयर बाजार में निवेश का बेहतर तरीका क्या हो सकता है ? इस साल हुए नुकसान के बाद कई लोग बाजार में पैसा डालने में मुकम्मल एहतियात बरत रहे हैं। जानकारों का कहना है कि इन हालात में इक्विटी यानी शेयर बाजार में निवेश के लिए सिस्टमेटिक इनवेस्टमेंट प्लान (एसआईपी) बेहतर जरिया हो सकता है। जो लोग लंबे वक्त के लिए बाजार में पैसा लगाते हैं , एसआईपी उनकी पसंद रहा है। कई निवेशकों ने इक्विटी म्युचूअल फंडों के लंबी अवधि के एसआईपी रिटर्न को देखते हुए इस तरीके को चुना है। इस वर्ष जनवरी से शेयर बाजार में मंदी का दौर चल रहा है। इस दौरान म्युचूअल फंड में पैसा लगाने वालों को भी अच्छा-खासा नुकसान उठाना पड़ा है। हालांकि , रिटर्न के लिहाज से 4 बेहतर डायवर्सिफाइड इक्विटी योजनाओं के इस साल के रिटर्न पर नजर डाली जाए तो इक्विटी में निवेश के लिए एसआईपी बेहतर जरिया बनकर उभरता है। इस लिस्ट में 2007 में प्रदर्शन के आधार पर टॉप 4 डायवर्सिफाइड इक्विटी सेक्टर फंडों को शामिल किया गया है। ये फंड सुंदरम कैपेक्स ऑपर्च्युनिटीज , आईडीएफसी प्रीमियर इक्विटी , कोटक ऑपर्च्युनिटीज और जेएम इमर्जिंग लीडर्स हैं। इन फंड के ग्रोथ ऑप्शन का रिटर्न देखा गया है। पहले निवेशक ने 10 जनवरी , 2008 को पूरा धन निवेश कर दिया था। दूसरी समान राशि की इक्विटी एसआईपी जिसका भुगतान प्रत्येक माह की 10 तारीख को किया जाता हो और इसकी शुरुआत 10 जनवरी , 2008 से हुई हो। तीसरी निवेशक सिस्टमेटिक ट्रांसफर प्लान के तहत 1 जनवरी , 2008 को लिक्विड फंड में निवेश करता है और इसके छठवें हिस्से के समान यूनिटों को 5 महीने के लिए प्रत्येक माह की तारीख को ट्रांसफर करता है। इसकी शुरुआत 10 जनवरी , 2008 से होती है। निवेशक बाकी की राशि को समान एसेट मैनेजमेंट कंपनी (एएमसी) की इक्विटी योजना में ट्रांसफर करता है। बाजार में गिरावट के दौर में इक्विटी में सिलसिलेवार तरीके यानी एसआईपी के जरिए किया गया निवेश एकमुश्त निवेश से बेहतर रहा। इसमें एनएवी में गिरावट का लाभ भी निवेशक ने अधिक यूनिट खरीदकर उठाया। तीसरी स्थिति में लिक्विड फंड में निवेश की वजह से गिरावट का असर और कम हुआ।
आईडीएफसी प्रीमियर इक्विटी फंड के मामले में फंड ने उल्लेखित अवधि में 31.09 फीसदी का नुकसान उठाया। लेकिन एसआईपी निवेशक के लिए यह नुकसान केवल 11.84 फीसदी का रहा और आईडीएफसी लिक्विडिटी मैनेजर से आईडीएफसी प्रीमियर इक्विटी के एसआईपी में नुकसान और कम होकर 11.07 फीसदी रह गया। तीनों स्थितियों में प्रदर्शन में अंतर जेएम इमर्जिंग लीडर फंड में आसानी से देखा जा सकता है। फंड के निवेशकों को वर्ष के पहले 3 महीनों में वैल्यू का काफी नुकसान हुआ। निवेशकों को यह बात याद रखनी चाहिए कि एसआईपी ने केवल संपत्ति बनाने के लिए बल्कि लंबी अवधि में कम अस्थिरता के साथ संपत्ति बनाने के लिए भी बेहतर है। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि वर्तमान में ऊंची मुद्रास्फीति दर की वजह से भले ही डेट निवेश का अच्छा विकल्प न माना जा रहा हो लेकिन अस्थिरता के दौर में यह मंदी से बचाने में काफी मददगार होता है। एक बात याद रखें कि इक्विटी फंड पर लंबी अवधि के पूंजीगत लाभ की गणना करते समय एसआईपी या एसटीपी में प्रत्येक निवेश को एक अलग निवेश माना जाता है। अगर बाजार में तेजी का दौर बरकरार रहता है तो निवेश को भुनाते वक्त दूसरे और तीसरे विकल्प पर आपको अधिक कर चुकाना पड़ सकता है। इससे बचने के लिए निवेशक सिस्टमेटिक विड्रॉअल का विकल्प अपना सकता है।

बच्चे के लिए तैयार करें निवेश योजना

अपने बच्चे के जन्मदिन पर आपने उसे कौन सा तोहफा देने की योजना बनाई है ? शायद कोई नया खिलौना , कुछ पुस्तकें या फिर महंगे कपड़े। अब कुछ अलग सोचने का समय आ गया है। आप इन तोहफों की जगह कोई ऐसी वित्तीय सौगात दे सकते हैं , जिसमें समय के साथ वृद्धि हो और आपका बच्चा आने वाले समय में आत्मनिर्भर बन सके। एक अतिरिक्त कोष बनाएं पार्क फाइनेंशियल अडवाइजर्स के निदेशक स्वप्निल पवार का कहना है , ' बच्चों की पढ़ाई और शादी के लिए आपको ज्यादा रकम जुटाने की जरूरत होती है। हो सकता है कि आप इनके लिए पहले से ही बचत कर रहे हों। पढ़ाई पिछले कुछ साल से लगातार महंगी हुई है। विदेश में पढ़ाई का खर्च तो काफी बढ़ गया है। ऐसे में अगर आप इसके लिए अतिरिक्त फंड बनाते हैं तो आपके बच्चे को काफी मदद मिल सकती है। ' आप इसके लिए पब्लिक प्रॉविडेंट फंड या यूनिट लिंक्ड इंश्योरेंस प्लान (यूलिप) में सालाना निवेश कर सकते हैं या फिर अलग से फंड बना सकते हैं। यह आपके बच्चे के लिए काफी मददगार साबित होगा। मिसाल के लिए , अगर बच्चा लीक से हटकर किसी प्रोफेशन में जाने का फैसला करता है तो हो सकता है कि पहले 2 साल में उसे वित्तीय परेशानी हो। ऐसी स्थिति में पहले से मौजूद फंड मददगार साबित होता है। अगर बच्चा भारत या विदेश में किसी प्रमुख संस्थान से एमबीए करने की योजना बनाता है तो उसके लिए लोन लिया जा सकता है। हालांकि , अगर आपके पास पहले से फंड है तो बच्चे की पढ़ाई के लिए ज्यादा कर्ज लेने की जरूरत नहीं पड़ती। ट्रस्ट बनाएं आप परिवार के किसी सदस्य के साथ मिलकर ट्रस्ट भी बना सकते हैं और इसमें खुद ट्रस्टी के तौर पर शामिल हो सकते हैं। आप चाहें तो यह काम पेशेवर लोगों को भी सौंप सकते हैं। ट्रस्ट आपकी रकम को निवेश में लगाएगा और बच्चे के लिए अच्छा फंड तैयार हो जाएगा। धन किस तरह निवेश किया जाना है , इसका फैसला आप स्वयं भी कर सकते हैं।
आप यह भी तय कर सकते हैं कि ट्रस्ट की कुल रकम में से बच्चे के हिस्से कितना पैसा आएगा। मान लीजिए आपने ट्रस्ट में 10 लाख रुपए जमा किए हैं और यह राशि 10 साल में बढ़कर 20 लाख रुपए हो जाती है। अगर आपने यह फैसला किया है कि ट्रस्ट की कमाई का 50 फीसदी हिस्सा प्रतिवर्ष आपके बच्चे को मिलेगा तो अगर ट्रस्ट अपने निवेश से सालाना 1 लाख रुपए अर्जित करता है तो बच्चे को इसमें से 50,000 रुपए की राशि मिलेगी। वसीयत तैयार करें वसीयत का केवल यह अर्थ नहीं होता कि आप अपने पीछे भारी धन संपत्ति छोड़कर जा रहे हैं। यह आपके जीवन का बहीखाता होता है। आप इसमें यह जानकारी भी दे सकते हैं कि संपत्ति जुटाने और बच्चों के लिए कोष बनाने में आपको कितनी मुश्किलों का सामना करना पड़ा। इससे आपके बच्चे को धन के महत्व का पता चलेगा। आप चाहें तो बच्चे के नाम पर कुछ शेयर भी खरीद सकते हैं और वसीयत में इस बात की जानकारी दे सकते हैं कि वह इन्हें कब भुना सकता है। बच्चे के 12 साल की आयू पूरा होने पर आप उसका खाता भी खुलवा सकते हैं। यह खाता पब्लिक प्रोवीडेंट फंड (पीपीएफ) या किसी अन्य इक्विटी निवेश के लिए भी हो सकता है। बच्चे को वित्तीय जगत से रूबरू कराने के लिए आप उससे बैंक के चेक या अन्य जरूरी फॉर्म भरवाने से शुरुआत कर सकते हैं। इससे बच्चा उस समय के लिए तैयार हो सकेगा जब उसे खुद ही अपने वित्तीय मामलों से निपटने की जरूरत होगी।

बेहतर रिटर्न के लिए लगाइए सोने पर दांव सोने से अच्छा हेजिंग का कोई विकल्प नहीं

नई दिल्ली : सोने में निवेश पर वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के डायरेक्टर दिलीप सोडा से बात
क्या सोने में निवेश करने का यह सही समय है?
हां, महंगाई के खिलाफ सोने से अच्छा हेजिंग का कोई विकल्प नहीं है। त्योहार और शादियों से सीजन में इसकी कीमत बढ़ती है। ऐसे में सोने में पैसा लगाने के लिए यह सही वक्त है।
सोने में अगले 3 महीने में क्या रुख रहेगा?
सोने की कीमत कई चीजों से तय होती है। इसलिए इस बारे में कुछ भी कहना मुश्किल है। पिछले 6 महीनों में देश में सोने की मांग में 45 फीसदी की कमी आई है। यह कमी इसकी ज्यादा कीमत की वजह से आई। हालांकि, 15 जुलाई के बाद से सोने के दाम में 2,000 रुपए की गिरावट आई है। इससे घरेलू बाजार में इसकी मांग बढ़ रही है।
डॉलर के मजबूत होने और कच्चे तेल के दामों में गिरावट का सोने की कीमतों पर क्या असर पड़ेगा? डॉलर जैसे-जैसे मजबूत होगा, सोने की कीमतों में गिरावट आएगी। हालांकि, लंबे वक्त को आधार बनाएं तो कच्चे तेल और सोने की कीमतों में कोई संबंध नहीं दिखता। पिछले 20 से 30 साल के दौरान कच्चे तेल और सोने की कीमतों में कोई खास संबंध नहीं दिखता।
सोने में निवेश करने पर कितना रिटर्न मिल सकता है?
लंबे समय के लिए सोने में निवेश किया जा सकता है। हालांकि, इसमें पैसा लगाना शेयर बाजार में निवेश से अलग है। 2--2 में सोने की कीमत 270 डॉलर प्रति आउंस थी। 1,000 डॉलर का स्तर छूने में सोने को 6 साल लग गए। इक्विटी से तुलना करें तो पिछले 6 महीने में शेयर बाजार का रिटर्न नेगेटिव रहा है। हालांकि, इस दौरान सोने ने अच्छा रिटर्न दिया है। गोल्ड ईटीएफ (एक्सचेंज ट्रेडेड फंड) ने पिछले 6 महीनों में 20 फीसदी का रिटर्न दिया है।
एक निवेशक को अपने पोर्टफोलियो में सोने को कितनी प्रमुखता देनी चाहिए?
सोना जोखिम को संतुलित करता है। एक निवेश को कम से कम अपने कुल पोर्टफोलियो का करीब 10-15 फीसदी हिस्सा सोने में निवेश करना चाहिए। मेरी सलाह है कि सोने में निवेश कम से कम 1 से 2 के लिए किया जाना चाहिए। जो लोग ज्यादा खतरा नहीं उठाना चाहते, उनके लिए पोर्टफोलियो का 10 फीसदी निवेश सोने में सही है। आक्रामक निवेशकों के लिए यह सीमा 15 फीसदी हो सकती है।
गोल्ड बार, जूलरी और ईटीएफ में से निवेशकों के लिए क्या बेहतर है?
सोने के जेवरात निवेश का बेहतर विकल्प नहीं हैं। इसे बेचने पर 15 फीसदी रकम कम हो जाती है। हालांकि, यहां यह भी ख्याल रखना चाहिए कि जूलरी को पहना जा सकता है। गोल्ड बार या सोने के सिक्के में भी औसतन 4 फीसदी रकम कम हो जाती है। अगर सिर्फ निवेश करना हो तो गोल्ड ईटीएफ सबसे बेहतर विकल्प है। इस पर आपको सिर्फ सालाना शुल्क देना पड़ता है, जो करीब 1 फीसदी है।

क्या है सबप्राइम लोन?

क्या है सबप्राइम लोन?
अमेरिका में लोन लेने वालों की रेटिंग दो तरीके से की जाती है। पहला प्राइम और दूसरा सबप्राइम। प्राइम के तहत वैसे लोग आते हैं, जिनका लोन चुकाने का रेकॉर्ड अच्छा रहा है।सबप्राइम में वे ग्राहक आते हैं जिनका लोन चुकाने का रेकॉर्ड अच्छा नहीं है। सबप्राइम के तहत आने वालों को दिया जाने वाला लोन सबप्राइम लोन कहलाता है। साधारण तौर पर बैंक ऐसा लोन नहीं देना चाहते।
क्यों दिया गया लोन?
2002 से 2007 के बीच बैंकों ने अपने सब्सिडियरी कंपनियों के जरिये सबप्राइम लोन जमकर बांटें। ऐसा करने के पीछे तर्क यह था कि 1997 के बाद अमेरिकी रीयल एस्टेट सेक्टर में जबर्दस्त बूम आया। ऐसे में माना गया कि लोग अपना लोन चुकाएंगे ही क्योंकि वे घर बनाने या खरीदने के लिए लोन ले रहे हैं। सरकार ने भी बैंकों को सबप्राइम लोन बांटने के लिए प्रोत्साहित किया।
क्यों दिया गया लोन?
बड़े फंड़ निवेशकों जैसे हेड फंड और म्यूचुअल फंडों ने सबप्राइम लोन पोर्टफोलियो को इनवेस्टमेंट के लिए अच्छा माना। ऐसे में उन्होंने लोन देने वालों से भी इस पोर्टफोलियो की खरीदारी की। इसका असर यह हुआ कि बैंकों के पास फिर से लोन देने के लिए पैसा आ गया और सबप्राइम लोन बाजार तेजी से बढ़ने लगा।
कितना देना होता था ब्याज
चूंकि इसमें पैसे डूबने का रिस्क ज्यादा था, इसलिए प्राइम लोन के मुकाबले इस पर दो परसेंट ज्यादा ब्याज रखा गया था। ऐसे में ईएमआई भी ज्यादा होता था। इससे निपटने के लिए बैंकों ने एक नया फॉर्म्युला अपनाया, जिसके तहत पहले दो साल में सिर्फ ब्याज अदा करने को कहा जाता था और मूलधन का भुगतान दो साल बाद करने को कहा जाता था।
कैसे आया संकट?
2007 के बाद रीयल एस्टेट कारोबार में बूम खत्म हो गया। ऐसे में मकानों की कीमतें गिरने लगीं और सबप्राइम लोन न चुकाने वालों की संख्या भी बढ़ती गई। चूंकि यह लोन ज्यादातर मकानों के बदले दिए गए थे इसलिए ऐसे मकानों को जब्त किया जाने लगा और बाजार में इनकी संख्या भी बढ़ती गई।
इस सबका नतीजा यह हुआ कि मांग में और कमी आने लगी। कीमतें और गिरने लगीं। ऐसे में मकान बेचकर लोन के पैसे की पूरी तरह से उगाही नहीं हो पाई और बैंको को घाटा उठाना पड़ा।
क्या हुआ असर
ग्लोबल बैंकों और ब्रोकरों ने अब तक 512 अरब डॉलर घाटे का आकलन किया है। सिटीग्रुप 55.1 अरब डॉलर के नुकसान के साथ पहले और मेरिल लिंच 52.2 अरब डॉलर के साथ दूसरे स्थान पर रहा। कुल नुकसान का आधा करीब 260 अरब डॉलर का नुकसान अमेरिकी फर्मों को झेलना पड़ा, जबकि यूरोपीय फर्मों को करीब 227 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। एशियाई फर्मों को 24 अरब का नुकसान उठाना पड़ा।
ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े इनवेस्टमेंट बैंक और सिक्योरिटीज ट्रेडिंग फर्म बेयर र्स्टन्स को जबर्दस्त झटका लगा और बाद में उसे जेपी मॉर्गन चेज के हाथों बिकना पड़ा। अब लीमैन ब्रदर्स को भी दिवालियेपन की अर्जी दाखिल करनी पड़ी है, जबकि मेरिल लिंच को बैंक ऑफ अमेरिका के हाथों बिकना पड़ा।
बाकी दुनिया पर क्यों हुआ असर
अमेरिका दुनिया का सबसे ज्यादा उधार देने वाला देश है। इसके अलावा सभी देश अपने फॉरेन एक्सचेंज रिजर्व को डॉलर के रूप में रखते हैं और उसे अमेरिकी सिक्योरिटीज में इनवेस्ट करते हैं। ऐसे में अमेरिका के किसी भी संकट का इन पर प्रभाव पड़ना लाजमी है।

Warren Buffett Inspirational Quotes

Warren Buffett Inspirational Quotes

"When you combine ignorance with leverage, you get some pretty interesting results." - Warren Buffett (Sub-Prime)

"In the business world, the rearview mirror is always clearer than the windshield."
"Wide diversification is only required when investors do not understand what they are doing."
"I don't look to jump over 7-foot bars: I look around for 1-foot bars that I can step over."
"We enjoy the process far more than the proceeds."
"Can you really explain to a fish what it's like to walk on land? One day on land is worth a thousand years of talking about it, and one day running a business has exactly the same kind of value."
"I will tell you how to become rich. Close the doors. Be fearful when others are greedy. Be greedy when others are fearful."
"We will reject interesting opportunities rather than over-leverage our balance sheet."
"If you don't know jewelry, know the jeweller."

Wednesday, September 17, 2008

5 questions investors are asking now

5 questions investors are asking now
At Personalfn, we routinely interact with investors. And ever since the equity markets turned volatile, we have (expectedly) come face to face with several hassled and confused investors. Another pattern we have noticed is that a number of investors have similar concerns. We thought it would be interesting to address the 5 most common questions that investors are faced with now.

1. Is this the right time to invest in equities?

With equity markets descending from their record highs, several investors want to know if this is the right time to invest in equities. More importantly, they would like to know if markets have bottomed out.

As regards the former, it can be safely stated that the markets are attractively poised in terms of valuations. So does that mean investors across the board should get invested in equities? Not really. Only investors who can take on the risk associated with an equity investment should consider getting invested. Also, investors should be willing to stay invested for the long haul (at least 3-5 years). Then again, investors must honestly evaluate if they are competent enough to directly invest in equities.

If not, they would be better off opting for the mutual funds route and thus bank on the expertise of the fund manager and the fund house. As for the question about markets having bottomed out, to be honest, we are not equipped to predict when that will happen. However, for serious long-term investors, we believe that is an irrelevant parameter.

2. Which is the best SIP?

Ever since the markets turned volatile, SIPs (systematic investment plans) have emerged as a buzzword. Advisors, financial planners and fund managers are all exhorting investors to opt for SIPs. However, in all the SIP frenzy, investors seem to have been misled into believing that the SIP is an investment avenue.

SIP is simply a mode of investing in mutual funds, which permits investors to make staggered investments rather than a lump sum one. As a result, in volatile times, investors benefit by receiving a higher number of units and thereby lowering their average purchase cost.

In the world of investments, there is no such thing as a ‘best investment’; in other words, one size doesn’t fit all. An investment that is right for one investor can be grossly unsuitable for another. Hence the key lies in selecting an investment that’s right for the investor in question. And since there is no best investment, there is no best SIP either. Investors need to first identify mutual funds that are right for them, and then consider investing in them via the SIP route.

3. Should I sell off my ULIP?

When equity markets were surging northwards, apart from equities and mutual funds, ULIPs (unit linked insurance plans) were also favourites with investors. For investors, it was another opportunity to ride the rising markets; while for the insurance advisors, ULIPs offered the opportunity to garner attractive commissions. It was a win-win situation for all, until markets changed directions.

Now with the markets falling, investors are seeing the value of their ULIP investments decline with each passing day. The higher expenses charged in the initial years are only adding to the agony. Both investors and insurance advisors are responsible for this scenario. Investors, for having made ill-informed investment decisions and advisors for having mis-sold ULIPs and/or failing to adequately educate investors.

The trouble is that there is no universal answer to this question. Investors who are invested for the long haul (10-15 years or thereabouts) in a well-managed ULIP with the intention of achieving a predetermined investment objective should continue to stay invested. However, investors who got invested for the wrong reasons or in the wrong ULIP may have to consider making an exit after consulting with their advisors. Such investors would do well to explore all available options and also study the implications of making a premature exit, before making a decision.

4. Are FMPs risk-free investment avenues?

The rising yields in debt markets have resulted in FMPs (fixed maturity plans) emerging as attractive investment options for investors. Also, the testing conditions in equity markets have in no small measure, contributed to the allure of FMPs. Simply put, FMPs are debt-oriented investment avenues from the mutual funds segment with a fixed investment tenure; also, they profess to offer a reasonably assured (predetermined) return. This is achieved by locking in a yield (return) at the time of getting invested. Hence an investor who is invested in the FMP until its maturity, is virtually assured of clocking the projected return.

However, it should be understood that FMPs are not the risk-free avenues they are made out to be. For instance, the possibility of the actual return varying from the indicated return cannot be ruled out. Market conditions, inappropriate investments (say a credit default in any of the underlying investments) or even a poor investment style (a mismatch between the maturity profile of the FMP and that of its underlying investments) can be responsible for the same. In conclusion, while FMPs would qualify as low risk investment avenues, they are certainly not the risk-free avenues they are made out to be.

5. Is it safe to invest in company fixed deposits?

As the name suggests, company fixed deposits (FDs) is a term associated with FDs issued by companies. They are distinct from the FDs offered by post-offices and banks (like nationalised banks for instance). Company FDs are known to offer attractive returns vis-à-vis FDs issued by banks and post offices. But then the same comes at a price – higher risk. Company FDs are unsecured in nature. Hence, should a default occur, investors would find themselves in a rather unenviable situation. Of course, this doesn’t mean that every company FD is likely to result in a default; all the same, the risk involved shouldn’t be ignored.

Risk-averse investors who accord higher priority to safety of capital and an assured income over higher returns would do well to steer clear of company FDs, especially the ones that don’t carry an ‘FAAA’/equivalent credit rating indicating the highest degree of safety. For such investors fixed deposits from post-offices and nationalised banks may be more suitable.

Monday, September 15, 2008


शूरू कीजिए सिस्टेमैटिक इनवेस्टमेंट

अगर अपने पैसे की प्लानिंग हम कम उम्र से ही शुरू कर देंगे, तो आगे चलकर हमें ज्यादा परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। तो पेश हैं, पर्सनल फाइनेंस के 5 टिप्स...

बजट बनाएं

अक्सर हम इस सोच में पड़े रहते हैं कि हमारा पैसा कहां खर्च हो रहा है। महीने का बजट लिखने से हमें यह पता चल सकता है कि हम पैसा कहां खर्च कर रहे हैं और इस पर काबू पाने के लिए क्या किया जा सकता है। बजट में मनोरंजन और खरीदारी के खर्च के साथ ही बचत को शामिल करना न भूले

क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल

क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल आपात भुगतान या जीवन बीमा का प्रीमियम भरने के लिए करना चाहिए। अगर इसके इस्तेमाल में सावधानी नहीं बरती जाएगी तो कर्ज का फंदा कसता जाएगा।क्रेडिट कार्ड की ब्याज दरें काफी अधिक होती हैं। क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल के समय यह नियम याद रखना चाहिए, 'अगर हमारे पास नकदी नहीं है तो हम खरीदारी नहीं कर सकते।'

निवेश की जल्द शुरुआत

नौकरी के शुरुआती वर्षों में अक्सर जिम्मेदारियां कम होती हैं और धन और समय अधिक रहता है। तब एसआईपी में निवेश किया जाता है। इसकी शुरुआत आप 500 रुपए महीने से भी कर सकते हैं।

लक्ष्य तय करें

किसी भी निवेश योजना को तीन हिस्सों में बांटा जाना चाहिए। जैसे इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खरीदना छोटा निवेश है। उच्च शिक्षा की योजना बनाना उससे बड़ा और मकान खरीदने की योजना बनाना लंबे समय के लिए किया जाने वाला निवेश है।यह तय करने के बाद देखें कि इसे पूरा करने के लिए कितनी राशि की जरूरत होगी। इसके बाद अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार, निवेश करें। अधिक जोखिम उठाने वाले लोग इक्विटी में धन लगा सकते हैं। अगर आप जोखिम नहीं चाहते तो सावधि जमा या डेट में निवेश आपके लिए बेहतर रहेगा।

लोन चुकाने में देर न करें

उन लोन्स को पहले चुकाएं जिसकी ब्याज दर अधिक है। क्रेडिट कार्ड पर लिया गया लोन इनमें सबसे पहले आता है। लोन तभी लें जब इसकी बहुत जरूरत हो। वरना यह आपको वित्तीय और मानसिक दबाव देगा।

डिविडेंड यील्ड बताती है निवेश की वैल्यू

इक्विटी में पैसा लगाने वाले निवेशक 2 तरह के रिटर्न पर गौर करते हैं। एक है पूंजी में इजाफा यानी शेयरों के बाजार भाव में बढ़ोतरी। दूसरी आमदनी होती है डिविडेंड या लाभांश से। कंपनियां अपने मुनाफे में से इक्विटी शेयरों पर डिविडेंड की घोषणा करती हैं। सभी खर्चों के निपटारे के बाद जो पैसा बचता है, उसका इस्तेमाल बचत बढ़ाने और डिविडेंड में किया जाता है। डिविडेंड की घोषणा शेयरों के फेस वैल्यू के आधार पर की जाती है। मसलन, 10 रुपए के फेस वैल्यू वाले शेयर पर 10 फीसदी डिविडेंड का मतलब है 1 रुपए प्रति शेयर का लाभांश। अगर आपने शेयर को खरीदने के लिए 20 रुपए चुकाए हैं तो डिविडेंड के तौर पर 10 रुपए मिलेंगे। यहां डिविडेंड यील्ड 5 फीसदी होगी। डिविडेंड यील्ड का पता लगाना बेहद जरूरी है। इससे मालूम होता है कि निवेश पर वास्तविक मुनाफा कितना मिला। डिविडेंड यील्ड से विश्लेषकों को निवेश की वैल्यू का पता लगाने में भी मदद मिलती है। इस आधार पर यह फैसला किया जाता है कि क्या किसी शेयर में पैसा लगाया जाना चाहिए या नहीं। जरूरी नहीं कि ज्यादा डिविडेंड यील्ड हर सूरत में बढि़या निवेश का संकेत दे। मुमकिन है कि किसी शेयर की डिविडेंड यील्ड ज्यादा हो, लेकिन उसकी कीमत में बढ़ोतरी उतनी अच्छी न हो। ऐसे में ज्यादा डिविडेंड यील्ड के हिसाब से किया गया निवेश बेकार साबित हो सकता है। निवेश के लिहाज से डिविडेंड यील्ड और शेयर के दाम में इजाफा, दोनों ही जरूरी हैं। शेयर की मौजूदा डिविडेंड यील्ड की एक वक्त के बाद तुलना करने से आप यह पता लगा सकते हैं कि क्या डिविडेंड में इजाफा शेयर का बाजार भाव बढ़ने के अनुपात में हुआ है या नहीं? कंपनी के डिविडेंड भुगतान के चलन के आधार पर आप उसके इतिहास और ग्रोथ के लिहाज से एक उम्मीद बांधते हैं कि एक कंपनी कितना डिविडेंड देगी। निवेशक विश्लेषण के लिए एक वक्त के बाद इस इसकी तुलना कर सकते हैं। डिविडेंड यील्ड यह भी बताती है कि निवेशक के शेयर का खरीद मूल्य का कितना फीसदी हिस्सा उसे डिविडेंड के रूप में लौटाया गया। इस तुलना के लिए सटीक रकम का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता। कई निवेशक ऐसे हैं जो डिविडेंड के जरिए नियमित आमदनी को तरजीह देते हैं। ऐसे निवेशक उन शेयरों पर गौर करते हैं, जिस पर डिविडेंड भी बढ़ता है। आम तौर पर ऐसा होता है कि कम बाजार भाव और ज्यादा डिविडेंड भुगतान के आधार पर डिविडेंड यील्ड ज्यादा बैठती है। डिविडेंड यील्ड एक ऐसा आसान जरिया है, जिससे कोई भी निवेशक शेयरों में अपने निवेश की गणना कर सकता है।

कम उम्र से ही डालें निवेश-बचत की आदत

जब हम कॉलेज से निकलते हैं या अपनी पहली नौकरी में होते हैं तो बचत और निवेश जैसे शब्द जेहन में नहीं आते। हमारी प्राथमिकता महंगा मोबाइल फोन या पसंदीदा कार होती है। युवाओं में ऐसी इच्छाएं पैदा होना स्वाभाविक है। आज के जमाने में मीडिया का प्रभाव अधिक होने की वजह से अक्सर लोग ऐसी चीजों को हासिल करने के लिए आकर्षित हो जाते हैं। युवा लोगों को वित्तीय रूप से सुरक्षित बनाने के लिए मैं पर्सनल फाइनेंस के 5 टिप्स पर चलने की सलाह दूंगा : बजट बनाएं अक्सर हम इस सोच में पड़े रहते हैं कि हमारा धन कहां खर्च हो रहा है। लिखित बजट बनाने से हमें यह पता चल सकता है कि हम कहां धन खर्च कर रहे हैं और इस पर नियंत्रण के लिए क्या किया जा सकता है। बजट में मनोरंजन और खरीदारी के खर्च के साथ ही बचत को शामिल करना न भूलें। इसे उतना ही महत्व देना चाहिए जितना हम अपने मासिक बिलों को देते हैं। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल क्रेडिट कार्ड आसानी से उपलब्ध होने की वजह से अब खर्च भी बढ़ रहा है। क्रेडिट कार्ड का इस्तेमाल आपात भुगतान या जीवन बीमा का प्रीमियम भरने के लिए करना चाहिए। अगर इसके इस्तेमाल में सावधानी नहीं बरती जाएगी और ' न्यूनतम भुगतान के विकल्प ' का इस्तेमाल किया जाएगा तो कर्ज का फंदा कसता जाएगा। क्रेडिट कार्ड की ब्याज दरें काफी अधिक होती हैं। क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल के संबंध में यह नियम याद रखना चाहिए , ' अगर हमारे पास नकदी नहीं है तो हम खरीदारी नहीं कर सकते। ' निवेश की जल्द शुरुआत नौकरी के शुरुआती वर्षों में अक्सर जिम्मेदारियां कम होती हैं और धन और समय अधिक रहता है। एसआईपी में नियमित अंतराल पर निवेश किया जाता है। इसकी शुरुआत आप 500 रुपए महीना से भी कर सकते हैं।
उद्देश्य तय करें किसी भी निवेश योजना की शुरुआत उद्देश्य के साथ होनी चाहिए। उद्देश्य को लघु , मध्यम और लंबी अवधि में बांटना चाहिए। इसके कुछ उदाहरण इस प्रकार हैं - इलेक्ट्रॉनिक गैजेट खरीदना ( लघु अवधि ), उच्च शिक्षा की योजना बनाना ( मध्यम अवधि ) और मकान खरीदने की योजना बनाना ( लंबी अवधि ) । निवेश का उद्देश्य तय करने के बाद यह देखें कि इसे पूरा करने के लिए कितनी राशि की जरूरत होगी। इसके बाद आप निवेश की राह पर बढ़ सकते हैं। अपनी जोखिम उठाने की क्षमता के अनुसार , निवेश का विकल्प चुनना बेहतर रहता है। अधिक जोखिम उठाने वाले लोग इक्विटी में धन लगा सकते हैं। अगर आप जोखिम नहीं चाहते तो सावधि जमा या डेट में निवेश आपके लिए बेहतर रहेगा। कर्ज चुकाने में देर न करें कर्ज के भुगतान में ऐसे कर्ज को प्राथमिकता दें , जिसकी ब्याज दर अधिक है। क्रेडिट कार्ड पर लिया गया कर्ज इस श्रेणी में आता है। ऋण तभी लें जब इसकी बहुत अधिक आवश्यकता हो। अनावश्यक जरूरतों के लिए कर्ज लेने से आप पर वित्तीय और मानसिक दबाव बढ़ता जाएगा।

Friday, September 12, 2008

Systematic Investment Planning

Systematic is the word that describes you. Organised, well-managed and planned in all your activities. Whether it is earning, saving or spending, everything is done in a methodical manner. Well… err… except for investing. But then you are not to blame. You never had enough money. Or, sometimes it was shortage of time. If this is the case, then it's time you had a look at the systematic investment plan (SIP) of mutual funds. A SIP is nothing but a planned investment programme, which takes a small sum of money from you and invests it in a mutual fund at regular intervals. The minimum amount can be as small as Rs 500 and the frequency of investment is usually monthly or quarterly. This simple programme has a number of advantages.First, if saving is an arduous task for you, then SIP can do this for you. Money deducted from your account (through post-dated cheques) and invested is money you cannot spend. And a rupee saved is a rupee earned. Even if each investment is small, over time this can add up to a neat kitty. And the power of compounding can do wonders. In due course of time, a small amount can grow into a significant amount. More importantly, an SIP does away with the need or effort to time the market. When the market is falling you may feel that it may decline further and that you should wait a while. Often stock markets make a recovery before you notice and the opportunity is lost. When markets are rising it is scary to invest money. Isn't it better that you wait for a correction and then make an investment? But if the correction doesn't come about, then even this opportunity is missed. And if markets are going nowhere, then what is the point in investing at all?So, trying to find out which is the best time to invest can be a tough task. And that's why it is said that timing the market is futile. If one could take advantage of the ups and downs that markets encounter, it would be great. And this is where SIP fits in. By the process of regular investing one gets to invest in the highs as well as the lows, and this helps in averaging out the volatility in the market.Some mutual funds suggest that contribution to an SIP programme should be increased in a full-fledged bear market. While this may be emotionally difficult, it can be rewarding when markets recover. But then this appears very much like timing the market and the purpose of an SIP is to avoid this effort.Thus, an SIP imparts discipline to investing. Whether it is the regular act of saving or investing, an SIP does both automatically. While there are certain benefits of an SIP please remember it is no wonder drug that cures all investment-related ailments.An SIP does not guarantee returns or positive returns. If you opt for an SIP in a falling market and the market continues to fall, then your investments will suffer a loss on the whole. An SIP does not guarantee a better return than a one-time investment. If you made a one-time investment when the Sensex was at 2,834 points in October 2002, then this would have performed better as compared to carrying out an SIP by spreading the investment over a period of time.The emphasis on averaging out in an SIP obviously makes it most useful in case of an equity fund, as the volatility is greater here. An SIP can be useful for a debt fund as well...to help build a pool of savings. It can be thought of something akin to a recurring deposit where a part of your savings is automatically deducted from your account.Overall, an SIP is a simple device that helps you to save and invest in a disciplined manner without having to time the market.

Dividends - Something Extra?

Most mutual fund schemes come in three options - dividend, dividend reinvestment and growth. The fact that under the dividend option the fund keeps on declaring regular dividends and no such payments accrue under the growth option might suggest to some investors that the former are more yielding. However, the truth is that it does not make a dime of difference which option you choose, from the pure investment-yield point of view. The form in which you choose to receive the gains might have tax implications though.When your fund pays out a dividend all it has done is
- paid out the gains it has generated instead of accumulating it. So now the onus of investing this money falls back on you. Moreover, any dividend paid means that the fund pool is smaller by the amount of the payout and this is reflected in the lower NAV. Had the fund not paid the dividend, it would have been reflected in the higher NAV of the fund and as a result the value of the units held by you would have appreciated which you would have realised on redemption. Under the dividend reinvestment option, the same dividend amount as paid under the dividend option is paid. However, instead of an absolute amount, the dividend is paid in the form of higher units issued to the investor.There is a caveat, though. Investors should opt for that option that minimises their tax liability. If dividend income is tax-free (as is the case with dividends from equity funds), then the dividend option or the dividend reinvestment option is a good bet. If capital gains are tax-free (as is the case currently with equity-oriented funds) then choosing the growth option would probably be more viable. If both are tax-exempt, the net returns will be identical from any option.

Saturday, September 6, 2008

Market ups & downs – What should you do now?

On Tuesday we witnessed a strong rally in the equity markets after a negative gap down opening. I bet none would have expected a rally of this nature to happen. At one point of time, Sensex was up 551 points, Nifty was up 164 points and Crude was down to $106 levels. I remember earlier in the day or a day before, a market veteran predicting Sensex levels of 10000 levels. He was a strong bull earlier but suddenly changed track. Now he is back with views that of a bull. In my view, predicting Sensex levels has become an exciting game, something that provides nothing beyond entertainment. You are right sometimes and wrong sometimes.

This reminded me of one of Wall Street’s famous joke which goes like this.

A stock analyst and a Wall Street broker went to the races. The broker suggested betting $10,000 on a horse. The analyst was skeptical, saying that he wanted first to understand the rules, to look on horses, etc. The broker whispered that he knew a secret algorithm for the success, but he could not convince the analyst.

"You are too theoretical," he said and bet on a horse. Surely, that horse came first bringing him a lot of money. Triumphantly, he exclaimed: "I told you, I knew the secret!"

"What is your secret?" the analyst asked.

"It is rather easy. I have two kids, three and five year old. I sum up their ages and I bet on number nine."

"But, three and five is eight," the analyst protested.

"I told you, you are too theoretical!" the broker replied, "Haven't I just shown experimentally that my calculation is correct?!"

Likewise one right guess and one feels confident of having cracked the code. If you happen to listen to market analysis carefully, there will be one bullish analyst and one bearish analyst. Both of them sound convincing. You might then wonder “Is this rally for real though?”

So you look out for cues in the international market and are glued to the Dow. The Dow and Nasdaq open with a bang with stocks registering good gains on the drop in crude prices. At the same time gold opened lower to around $ 802 an ounce.

Worries of slowing global demand and the fact that Hurricane Gustav was downgraded to category 2 helped ease oil prices significantly. Gustav was then further downgraded to a tropical depression. September generally takes the cake for being a hurricane month and there are 2 more hurricanes in the pipeline. This will have good or bad impact on the direction of oil prices. Oil has corrected by more than 30% from its peak. However oil is still at significantly higher levels than what it was the same time last year. It was in the region of $65-74.

Oil has still a long way to go on the way downward if any further rallies are to be expected. As oil prices cool off, you will see inflation and the macro numbers improving and this will create a strong platform for the next leg of the rally. However we are not yet out of the woods because one bad macro headline has the propensity to tumble global markets and also take Indian markets lower. The situation on the ground is that any good or bad headlines can push the market accordingly in respective directions.

In one of my previous columns, we had mentioned about rumors on Lehman Brothers. Tuesday witnessed a rally in Lehman shares after Korean Development Bank confirmed news of being in talks to buy a stake in Lehman. Lehman Brothers one of the biggest investment banks in the US is down almost 75% from its 52-week high of $67.73 to around $16. What would happen if Lehman or any other US financial institution (including some of the insurance companies) bites the dust? The markets might not take this lightly but at the same time it can be argued that the market has already discounted such news in the stock prices of these firms.

So what should you do in today’s market?

At the risk of sounding repetitive, here are some principles.

Don’t be concerned about what your friend, family member or other person is doing. You have to win your race but that does not mean you need to beat everyone else. Each one of us can be a winner provided we know what we want. If all you need is 8% returns, realign your investment accordingly. If you need 12-15%, then realign your portfolio in terms of equity.
Don’t aim for the highest returns because there is nothing called as highest returns. It’s all relative to some other number. Most sins in the equity market are committed when we aim for the highest returns. If you have got 30% from equity in a year, why should you be concerned if someone else has got 60%? You don’t know the risk that has been taken or whether it was an act of luck (as discussed in the horse racing story). You would do well to stay away from quacks who tell you what will give you the highest returns. Just day before there was a story of how a couple duped several High Networth investors including doctors, professionals and a yogi of several crore of rupees by promising to double their money.
Don’t invest in equities if you are not in it for the long haul (Trading is different and not meant to be confused with investing). Today the average holding period of a stock might be a year or slightly more. There will be dips in the market along the way so take advantage of these downturns by investing in a staggered fashion, be patient and demonstrate a willingness to act when others don’t.
- Amar Pandit

Monday, September 1, 2008

Join The JAGO Party in Nation's Interest

The mission of Jago Party is to make India a safe, strong and prosperous country.Just click the below link to Visit Jago Party Website for more details:


Markets - Kal aaj aur Kal

Recently a friend asked me, "What are you recommending to your clients in these times?" Emphasis was on 'these times.' I was little confused. I did not understand the underlying meaning of 'these times'. According to me we are going through perfectly normal times. There isn't absolutely anything abnormal about 'these times'.

According to the friend, markets are down and times are bad. Now, I agree markets are down than the level we had seen at the beginning of the current year but what is bad about it. Isn’t it normal for market to go down?

The only constant in market is rise-fall-rise-fall. This has been happening ever since markets have been established. Somehow when markets are rising investors feel the rise will be forever and when it falls investor’s think of doomsday. Honestly markets move somewhere in between. They will never rise forever and there will never be dooms day. Only thing is investors who will spend ‘time-in’ the market will create wealth and investors who rely on ‘timing’ the market will eventually lose.

Though there is no empirical data to support the point, but the fact is that only fourth of the investors in equity market go on to create immense wealth from equity market and hold on to it for decades and generations. These are prudent investors. Prudent investor is one who makes good decision. Good decision comes from experience and experience comes from bad decision. Therefore those investors who would have made bad decisions and yet remained in market for long will create lots of wealth for long time. These are investors who would have seen at least two or more market cycles. Rest all investors enter equity markets during its rise. When markets fall they leave the market considering it to be speculation den. In next rise new set of investors enter market and the series continues.

Historically markets have risen, fallen and risen again. May it be Tulipsomenia in Holland in 1634, Equity markets bubble in London, Paris and Amsterdam in 1720, Railway mania of Britain in 1845, Rise and fall of Premchand Roychand in Mumbai in 1865 or recent tech bubble of 2000/2001!

In the year 1992, Indian equity markets started rising. Reasons – or we can say excuses – were liberalization, end of license raj, ‘tiger uncaged’ etc. At its peak Sensex crossed 4500 mark. Soon Harshad Mehta scam was unearthed. Sensex fell to around 2000 level, a fall of more than 50%. In 2000, when Sensex again started rising reasons were technology will change our lives. In this rally Sensex easily breached 4500 and went ahead to cross even 6000 mark in intra-day trading.

In 2001 market again fell. Reason was tech-bubble burst. By mid 2003 market was at 2700 level. Fall of more than 50% from its peak of 6000 during technology boom.

From mid 2003 equity markets again started going up. ‘Reason’ – “India Shining.” Soon market crossed 6000 level, which it had crossed in 2000 rally. In fact market went on to cross 21000 levels. When market fell, it went down to less than 13000 levels. Market fell because of reasons – inflation, oil prices, political uncertainly, sub-prime crisis etc.

So, the pattern of rise-fall-rise-fall is constant in the market though the reasons for rise-fall are different. Sir John Templeton has rightly said “The most dangerous words used in the stock market are, this time it's different.”
Gaurav Mashruwala