Wednesday, April 29, 2009

बोनस इश्यू क्या होता है?

जब शेयरधारकों को अपने पास मौजूद शेयरों के एक खास अनुपात में मुफ्त शेयर मिलते हैं, तो उसे बोनस इश्यू कहते हैं। जैसे अगर कोई कंपनी 2:5 का बोनस जारी करती है तो इसका मतलब आपके पास मौजूद हर पांच शेयर पर आपको 2 मुफ्त शेयर मिलेंगे।कंपनिया क्यों जारी करती हैं बोनस इश्यू?:जब कंपनियों के पास नकद रिजर्व बहुत ज्यादा हो जाता है, तो कंपनियां बोनस इश्यू जारी करती हैं। इससे कंपनी डिविडेंड के तौर पर अपने शेयरधारकों को ज्यादा रकम देती है। दूसरे शब्दों में कंपनी के नकद रिजर्व का बड़ा हिस्सा कंपनी के बही-खाते से निकलकर प्रमोटर के निजी खाते में आ जाता है, क्योंकि कंपनी का सबसे बड़ा शेयरधारक अमूमन उसका प्रमोटर ही होता है।
बोनस इश्यू से शेयरधारकों को क्या फायदा होता है?
एक तरह से कुछ भी नहीं। आम धारणा है कि बोनस शेयरधारकों के लिए काफी फायदेमंद होता है, लेकिन अगर कीमत के लिहाज से देखा जाए तो इसका कोई खास फर्क नहीं पड़ता। मान लें कि आपके पास 100 शेयर हैं और कंपनी ने एक पर एक शेयर के बोनस की घोषणा की तो आपके पास कुल शेयरों की संख्या बढ़कर 200 हो गई। इसी तरह अगर बाजार में कंपनी के एक करोड़ शेयर हैं तो उनकी संख्या दो करोड़ हो जाएगी। लेकिन इसी अनुपात में कंपनी की बाजार पूंजी में बढ़त नहीं हो सकती। इसलिए एक्स-बोनस यानी बोनस शेयरों के बाजार में आने के साथ ही सैद्धांतिक रूप से शेयरों के न भाव गिरकर आधे हो जाते हैं, यह अलग बात है कि व्यवहारिक तौर पर भाव बिल्कुल आधे नहीं होते, बल्कि उसी के आस-पास होते हैं।
फिर बोनस की घोषणा के बाद शेयर चढ़ता क्यों है?
इसका कोई ठोस या बुनियादी कारण नहीं बताया जा सकता। एक ओर तो बोनस जारी करने वाली कंपनी के बारे में निवेशकों की यह धारणा बनती है कि कंपनी नकद रिजर्व के मामले में बहुत मजबूत है और दूसरा लाभांश के तौर पर मिलने वाली रकम दोगुनी हो जाती है। इन सबसे कंपनी के शेयरों की मांग बढ़ जाती है।साथ ही बोनस के बाद क्योंकि कंपनी के शेयरों की कीमत उसी अनुपात में कम हो जाती है, तो उनका दैनिक कारोबार भी काफी बढ़ जाता है।
शेयर के फेस वैल्यू पर इसका क्या असर होता है?
बोनस के बाद कंपनी का फेस वैल्यू वही रहता है। दरअसल शेयर विभाजन यानी स्टॉक स्प्लिट और बोनस का मुख्य अंतर यही है कि बोनस में शेयर के दाम तो गिर जाते हैं, लेकिन इसके फेस वैल्यू में कोई बदलाव नहीं होता, दूसरी ओर स्प्लिट में फेस वैल्यू का भाव भी उसी अनुपात में कम हो जाता है।

शेयर गिरवी रखने का क्या मतलब है?

शेयर गिरवी रखने का क्या मतलब है?

प्रमोटरों द्वारा शेयर गिरवी रखने का चलन देश में नया तो नहीं है, लेकिन सत्यम घोटाले के बाद यह चर्चा का गरमागरम मुद्दा बन गया है। आमतौर पर प्रमोटर निजी या कंपनी की जरूरत पूरी करने के लिए कंपनी में अपने शेयर किसी वित्तीय संस्थान के पास गिरवी रखते हैं। गौरतलब है कि ऐसे लोन देने में गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान यानी एनबीएफसी बैंकों से ज्यादा आगे रहते हैं।

प्रमोटर कंपनी के शेयर गिरवी क्यों रखते हैं?

इसकी कई वजह हो सकती है। यह काम व्यक्तिगत कारणों या कारोबार के लिए विस्तार के लिए किया जा सकता है। कभी कभार प्रमोटर वारंट को शेयर में तब्दील करने के लिए अपने शेयर गिरवी रखते हैं। उदाहरण के लिए, हाल ही में केएस ऑयल ने वारंट को शेयर में तब्दील करने के लिए 50 करोड़ रुपए का कर्ज लिया।

हो सकता है कि उसे मंदी के मौजूदा बाजार में शेयरों की खरीदारी का सुनहरा मौका नजर आ रहा हो। ऐसे में खुले बाजार से शेयरों की खरीदारी के वास्ते रकम जुटाने के लिए वे यह रास्ता अपना सकते हैं।

इसकी जानकारी सार्वजनिक करने के क्या नियम हैं?

अमेरिका जैसे विकसित देशों में प्रमोटर ही नहीं कंपनी के निदेशकों को भी शेयर गिरवी रखने की सूचना देनी पड़ती है और ब्रिटेन में यह इनसाइडर ट्रेडिंग संबंधी नियमों के दायरे में आता है। सत्यम घोटाले के बाद पूंजी बाजार नियामक सेबी ने प्रमोटरों और प्रमोटर समूह के लिए सूचीबद्ध कंपनियों के शेयर गिरवी रखने की सूचना सार्वजनिक करना अनिवार्य कर दिया है।

इस नियम के हिसाब से जब कभी शेयर गिरवी रखे जाएं, तब तो इसकी प्रमोटर जानकारी दें ही, साथ ही इसकी सूचना नियमित रूप से भी सार्वजनिक करें। इसके अलावा प्रमोटरों को शेयर गिरवी रखने का ब्योरा उस स्टॉक एक्सचेंज को भी देना होगा जिनमें वह सूचीबद्ध हो।

इसमें प्रमोटरों को क्या जोखिम होता है?

हम पहले ही इस बात का जिक्र कर चुके है, बैंकर या फाइनेंसर शेयर गिरवी रखकर लोन देते हैं। इसलिए जब शेयरों का बाजार भाव गिरकर एक निश्चित स्तर तक आ जाता है, तब प्रमोटर को अतिरिक्त रकम का भुगतान करना होता है। अगर वह ऐसा नहीं कर पाता है तो उसे कुछ और शेयर गिरवी रखना पड़ेगा।

अगर प्रमोटर कुछ भी नहीं कर पाता है तो बैंकर या वित्तीय कंपनी गिरवी रखे गए शेयर बाजार में बेच सकता है। उसे ऐसा करने का पूरा अधिकार होगा। इसके अलावा जिस कंपनी के शेयर गिरवी रखे गए हैं उस पर जबरिया अधिग्रहण का खतरा हमेशा बना रहता है।

इससे कंपनी के निवेशकों के बीच क्या संदेश जाता है?

अगर प्रमोटर ने कंपनी के कारोबार में विस्तार के लिए शेयर गिरवी रखकर बाजार से रकम जुटाई है तो यह निवेशकों के लिए सकारात्मक है। अगर प्रमोटर ने किसी निजी काम के लिए पूंजी जुटाने के मकसद से शेयर गिरवी रखे हैं तो इसका सेंटीमेंट पर नकारात्मक असर होगा। अगर प्रमोटर ने ऐसा कंपनी की कारोबारी स्थिति बेहतर बनाने के लिए किया गया है, तो समझ लीजिए कि कंपनी को लिक्विटिडी की समस्या है।

सामान्य शेयरधारकों और प्रमोटरों के शेयर गिरवी रखने के बीच क्या अंतर है?

बैंक और वित्तीय संस्थान शेयर गिरवी रखकर लोन देते हैं। इस लोन के लिए शेयरधारकों को लेंडर के पास शेयर गिरवी रखना पड़ता है। लेकिन प्रमोटरों से उलट छोटे शेयरधारकों को शेयर गिरवी रखने की बात का खुलासा करने की जरूरत नहीं होती है। निवेशकों को लोन लेने के लिए शेयर के प्रमाणपत्र को बैंक के पास गिरवी रखना पड़ता है।
-आनंद रवानी

ढलती उम्र के लिए नियमित आमदनी का इंतजाम

रिटायरमेंट के बाद की जिंदगी की वित्तीय योजना तैयार करने वालों के लिए फिक्स्ड इनकम उत्पाद और दूसरे डेट इंस्ट्रूमेंट पसंदीदा माने जाते हैं। कुछ लोग महंगाई दर की रफ्तार को पीछे छोड़ने की उम्मीद के साथ आमदनी का छोटा हिस्सा इक्विटी में लगाते हैं। रिटायरमेंट के बाद जब नौकरी नहीं होती तो लोग कम जोखिम और नियमित आमदनी चाहते हैं। लेकिन ऐसे कितने लोग होते हैं जो रिटायरमेंट के लिए की गई बचत से नियमित आमदनी हासिल करने में कामयाब रहते हैं ?

एक स्थिति का अनुमान लगाइए जिसमें एक व्यक्ति पांच साल के लिए 8 फीसदी की मामूली ब्याज दर पर फिक्स्ड डिपॉजिट में अपना पैसा लॉक इन करता है। पांच साल के बाद अगर दरों में गिरावट आती है तो वह नियमित आमदनी खो देगा। औसत आयु में बढ़ोतरी और मेडिकल तथा दूसरे आवश्यक खर्च बढ़ने से रिटायरमेंट के बाद के सालों की जरूरतों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आप यह कैसे सुनिश्चित कर सकते हैं कि रिटायरमेंट की जिंदगी में नियमित आमदनी आती रहे ?

पेश हैं कुछ रणनीतियां :

व्यवस्थित रूप से पैसा निकालना

आपका पैसा शेयरों , म्यूचुअल फंड , फिक्स्ड डिपॉजिट और बैंक खाते जैसे अलग - अलग वित्तीय उत्पादों में हो सकता है। अपनी सारी बचत को घर लाना समझदारी नहीं है। केवल वही पैसा निकालिए जिसकी जरूरत आपको तुरंत हो और शेष रकम में इजाफा होने के लिए उसे निवेश में ही रहने दीजिए। रणनीति इतनी पुख्ता होनी चाहिए कि अत्यधिक जरूरत न होने पर पैसा ही न निकाला जाए। कुछ लोग निवेश से होने वाली आमदनी इस्तेमाल करते हैं जबकि उनमें लगाई जाने वाली मूल राशि को नहीं छूते। म्यूचुअल फंड सिस्टेमेटिक विड्रॉल प्लान पेश करते हैं जिसमें निवेशक मासिक या तिमाही जैसी नियमित समयावधि में पैसा निकाल सकता है।



डायवर्सिफिकेशन

रिटायरमेंट संबंधी योजना की कामयाबी डायवर्सिफिकेशन पर निर्भर करती है। अपनी सारी रकम एक ही निवेश उत्पाद में मत लगाइए। शेयर बाजारों में जरूरत से ज्यादा निवेश जोखिमपूर्ण हो सकता है लेकिन यह मुद्रास्फीति दर के खिलाफ ढाल का काम करता है। म्यूचुअल फंड लंबी अवधि में काफी फायदेमंद साबित हो सकते हैं। लेकिन अगर बाजार ढहते हैं तो आपको उस वक्त कड़ी मेहनत की कमाई तक पहुंच नहीं मिलेगी जब आपको उसकी सबसे ज्यादा जरूरत होगी। डेट उत्पाद भी जोखिम से मुक्त नहीं होते। रियल एस्टेट निवेशकों को यह बात बखूबी पता होती है कि संपत्ति बेचकर पैसा जुटाना और उसकी सही कीमत हासिल करना हमेशा आसान नहीं होता। जोखिम सहने की अपनी क्षमता के आधार पर अलग - अलग एसेट श्रेणियों में अपने पोर्टफोलियो का डायवर्सिफिकेशन कीजिए क्योंकि अगर आर्थिक मंदी या किसी बाहरी कारण की वजह से कोई उत्पाद आपकी उम्मीदों के मुताबिक प्रदर्शन नहीं करता तो दूसरे प्रोडक्ट तूफान से आपकी कश्ती बाहर निकाल ले जाएंगे।

लैडरिंग से पहुंचिए मंजिल तक

फर्ज कीजिए कि फिक्स्ड डिपॉजिट पर रिटर्न में गिरावट आ रही है। आप अपना पैसा दूसरे बैंक में ले जाना चाहते हैं जो ऊंची दर पर ब्याज दे रहा है। हो सकता है कि किसी आपात स्थिति से निपटने के लिए आपको फिक्स्ड डिपॉजिट तुड़वाना पड़े। लेकिन फिक्स्ड डिपॉजिट तोड़ने का अपना नुकसान होता है। दरों में उठापटक के प्रतिकूल प्रभाव कम करने , तरलता बढ़ाने और अधिकाधिक रिटर्न हासिल के लिए लैडरिंग नामक रणनीति अपनाई जा सकती है। लैडरिंग से मायने निवेश की ऐसी तकनीक से है जिसमें अलग - अलग मैच्योरिटी तारीख वाले कई वित्तीय उत्पाद आप खरीदते हैं। यह रणनीति हालात सही न होने के वक्त रकम का बड़ा हिस्सा लॉक इन में फंसाने से बचाती है।

इसके तहत व्यक्ति विशेष पैसा लॉक इन करते वक्त अपनी जरूरतों को छोटी अवधि या लंबी अवधि के दो वर्गों में विभाजित कर सकता है। फिक्स्ड डिपॉजिट के तहत समूची रकम लॉक इन करने के बजाय उसके छोटे हिस्से कीजिए और अलग - अलग मैच्योरिटी तारीख वाले विभिन्न डिपॉजिट में पहुंचा दीजिए। अगर आपके पास 50,000 रुपए हैं तो आप सारी रकम पांच साल की फिक्स्ड डिपॉजिट में लॉक मत कीजिए। इसमें से 10,000 रुपए एक साल के डिपॉजिट , अगले 10,000 रुपए 2 साल के फिक्स्ड डिपॉजिट और शेष हिस्सा तीन साल के फिक्स्ड डिपॉजिट में डाला जा सकता है। अंतिम 10,000 रुपए पांच साल के डिपॉजिट में डाले जा सकते हैं। यह रकम नियमित अंतराल पर मैच्योर होगी , ऐसे में तय वक्त से पहले रिडेम्पशन कराने पर नुकसान होने की आशंका भी कम होगी।
-कविता श्रीराम

Monday, April 27, 2009

कम समय के निवेश के लिए लिक्विड फंड बेहतर

अगर आप बहुत कम समय के लिए निवेश पर अच्छा रिटर्न हासिल करना चाहते हैं तो इसका एक विकल्प लिक्विड फंड हो सकता है। लिक्विड फंड कम अवधि के डेट फंड होते हैं जो सर्टिफिकेट ऑफ डिपॉजिट्स, कमर्शियल पेपर और ट्रेजरी बिलों में एक रात, 10 दिन या एक महीने के लिए निवेश करते हैं। आमतौर पर लिक्विड फंड में निवेशक को एंट्री या एग्जिट लोड नहीं चुकाना होता। इन फंडों का इस्तेमाल लघु अवधि में नकदी के निवेश, एक वर्ष से कम समय के लिए निश्चित रकम की आमदनी और आने वाले समय में किए जाने वाले भुगतान के लिए किया जा सकता है। आप अगर भविष्य में कोई बड़ा निवेश करना चाहते हैं और उससे पहले अपनी नकदी को ऐसी जगह रखना चाहते हैं, जहां यह बेकार न बैठी रहे, तो उसके लिए भी ये फंड एक विकल्प हो सकते हैं। इनका इस्तेमाल सिस्टेमेटिक ट्रांसफर प्लान में भी किया जा सकता है। इनकम या बॉन्ड फंड की अवधि लिक्विड फंड के मुकाबले कहीं अधिक होती है और इनमें ज्यादा गिरावट के साथ ही अधिक उछाल आने की संभावना भी रहती है। ये फंड मध्यम से लंबी अवधि के निवेश के लिए बेहतर होते हैं। इनकम फंड कॉरपोरेट बॉन्ड और सरकारी सिक्योरिटीज जैसे लंबी अवधि के साधनों में धन लगाते हैं। बचत खातों में जहां ब्याज की दर चार फीसदी सालाना तक होती है, वहीं लिक्विड फंड का रिटर्न आठ फीसदी प्रतिवर्ष तक जा सकता है। इसके अलावा इन्हें भुनाना भी आसान होता है। निवेशक नेट असेट वैल्यू (एनएवी) पर इन्हें भुना सकते हैं। लिक्विड फंड में न्यूनतम 1,000 रुपए का निवेश किया जा सकता है। हालांकि, कुछ फंडों ने न्यूनतम निवेश की राशि 5,000 रुपए भी रखी है। पिछले पांच सालों में लिक्विड फंडों ने पांच से लेकर नौ फीसदी तक का रिटर्न दिया है। लिक्विड फंड के विकल्प लिक्विड फंड दो प्रकार के होते हैं। एक प्योर लिक्विड फंड और दूसरा लिक्विड प्लस। इन दोनों प्रकार के लिक्विड फंड में मुख्य अंतर उन सिक्योरिटीज की अवधि होती हैं जिसमें ये निवेश करते हैं। लिक्विड प्लस फंड जिन इंस्ट्रूमेंट में निवेश करते हैं उनकी अवधि प्योर लिक्विड फंड के पास मौजूद सिक्योरिटीज से अधिक होती है। कर बाध्यता की बात की जाए तो लिक्विड फंड पर 28.33 फीसदी का डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन कर चुकाना होता जबकि लिक्विड प्लस फंड में 14.16 फीसदी का कर देना होता है। फिक्स्ड डिपॉजिट (सावधि जमा) में लगभग नौ फीसदी का रिटर्न मिलता है और इस पर लगभग 33 फीसदी आयकर (10 फीसदी सरचार्ज अतिरिक्त) चुकाना होता है। एक वर्ष की मैच्योरिटी वाले लिक्विड फंड के डिविडेंड विकल्प में 28.33 फीसदी का डिविडेंड डिस्ट्रीब्यूशन कर देना होता है। लिक्विड प्लस फंड का निवेश काफी हद तक लिक्विड फंड के समान होता है लेकिन फंड का लगभग 30 फीसदी हिस्सा लंबी मैच्योरिटी अवधि वाले इंस्ट्रूमेंट्स में लगाया जाता है। इसमें मार्क-टू-मार्केट को लेकर कोई बाध्यता नहीं होती और लिक्विड प्लस फंड में कोई लॉक-इन अवधि भी नहीं रहती। कम कर लगने की वजह से भी लिक्विड प्लस फंड को ज्यादा पसंद किया जाता है। लिक्विड फंड पर 28.33 फीसदी के कर के मुकाबले लिक्विड प्लस फंड पर 14.16 फीसदी का कर चुकाना होता है। ये फंड लघु अवधि के लिक्विड फंड और लंबी अवधि के डेट फंड के बीच विकल्प देते हैं। ये उन लोगों के लिए अच्छे हैं जो कम अवधि के निवेश पर अच्छा रिटर्न चाहते हैं। लेकिन निवेशकों फंड द्वारा किए जा रहे निवेश को लेकर सतर्कता बरतनी चाहिए। पिछले वर्ष कुछ फंडों ने ऐसी कंपनियों के पेपर में धन लगाया था जिन्होंने डिफॉल्ट किए थे। इसका खुलासा होने के बाद निवेशकों ने बड़ी संख्या में फंडों को भुनाया था। अगर आप ऊंचे कर स्लैब में आते हैं तो आपके लिए लिक्विड फंड बेहतर रहेंगे क्योंकि इनमें कर कटौती के बाद ज्यादा रिटर्न मिलता है। ज्यादातर लिक्विड फंड कोई एंट्री या एग्जिट लोड नहीं वसूलते। इसके साथ ही इन्हें भुनाना भी आसान होता है। आप एक दिन के अंदर अपना धन वापिस ले सकते हैं।
-आशीष गुप्ता

Sunday, April 26, 2009

दुर्धटनाओं से न डरें, सतर्क रहें निवेशक

कई जानकार कह गए हैं कि कामयाबी का रास्ता कांटों भरा होता है। हालांकि, कांटों का जिक्र करना कुछ ज्यादा नाटकीय होगा लेकिन असल जिंदगी में भी हर चीज मुश्किलों से गुजरे बगैर नहीं मिलती। निवेश के मामले में भी बात कुछ ऐसी ही है। बाजार में अचानक गिरावट आने या इस खौफ के चलते कई लोग बाजार से दूरी बनाए रखने में ही बेहतरी समझते हैं कि अगर चीजों ने सही तरह से आकार नहीं लिया तो क्या होगा। अगर आप इस मानसिकता की तुलना गाड़ी चलाने से करें तो यह कुछ इस तरह होगा कि आप ड्राइविंग से इसलिए इनकार कर रहे हैं कि आपको डर है कि आपकी गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो सकती है।

अगर गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त होती है तो भी क्लेम सेटल करने के लिए बीमा कवर पर निर्भर कर सकते हैं। इसी तरह अगर शेयर बाजार में निवेश करने की प्रक्रिया में कुछ अवरोध पैदा होते हैं तो ऐसी खास प्रक्रिया और संस्थाएं हैं जो आपकी समस्याएं सुलझा सकते हैं। अगर आप इस बात को लेकर परेशान हैं कि कठिनाई सामने आने पर कैसे और किससे संपर्क करें तो अब आपको इंतजार करने की कोई जरूरत नहीं है। इकनॉमिक टाइम्स निवेशकों की कुछ सामान्य समस्याओं पर गौर कर रहा है और इस बात की जानकारी भी दे रहा है कि उनसे निपटने का क्या रास्ते हो सकते हैं...

बेवजह देर

जिन सामान्य दिक्कतों से ज्यादातर निवेशकों को रूबरू होना पड़ता है, उनमें आवंटित शेयरों की रसीद और रिफंड के आदेश मिलने में देर शामिल है। शेयरधारकों को पब्लिक इश्यू बंद होने के 15 दिन के भीतर आवंटित प्रतिभूति या रिफंड के ऑर्डर मिल जाने चाहिए लेकिन कई मामलों में इसमें काफी देर होती है। ऐसी सभी मामलों में शुरुआती कार्रवाई में निवेशक को कंपनी सेक्रेटरी या इश्यू के रजिस्ट्रार से संपर्क साधना चाहिए जिनके पास इन समस्याओं को दूर करने का अधिकार होता है। अगर आप पाते हैं कि कोई कार्रवाई नहीं की जा रही है या दूसरे पक्ष की ओर से हो रही कोशिशों को आप नाकाफी पाते हैं तो आपके सामने दो विकल्प बचते हैं। आप भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) या बम्बई स्टॉक एक्सचेंज की ओर से गठित निवेशक सेवाएं विभाग (डीआईएस) का दरवाजा खटखटा सकते हैं।

हालांकि, कंज्यूमर गाइडेंस सोसइटी ऑफ इंडिया के मानद सचिव एम एस कामत का कहना है कि ऐसे मामलों में यह साबित करने की जिम्मेदारी निवेशक पर है कि दूसरा पक्ष देर कर रहा है। उन्होंने कहा, 'आपको इस मामले से जुड़े सभी दस्तावेज रखने होते हैं। पैसे का भुगतान साबित करने वाली पर्ची, आवेदन पत्र जिसमें आपके आवेदन की तारीख का साफ-साफ उल्लेख हो। इसके अलावा बैंक का ब्योरा और वह तारीख जब आपको रिफंड ऑर्डर मिला है, इसका सबूत भी होना चाहिए।'

बकाया राशि न मिलना

एक और समस्या जिसका आपको सामना करना पड़ सकता है, वह यह है कि कंपनी की ओर से एलान होने के 30 दिनों के भीतर डिविडेंड आसानी से आपके बैंक खाते में नहीं पहुंचता। अगर कंपनी सेक्रेटरी या कंपनी की ओर से इस प्रक्रिया की निगरानी करने के लिए नियुक्त रजिस्ट्रार एंड ट्रांसफर एजेंट (आरटीए) कोई प्रतिक्रिया नहीं देता तो आपको डीआईएस या सेबी के पास जाना चाहिए। हालांकि, इस आवेदन के लिए आपके पास फोलियो नम्बर, सर्टिफिकेट नम्बर, अगर आप शेयरों का कारोबार अब भी कर रहे हैं तो एक खास अंक या ब्योरा या डिपॉजिटरी साझेदार के ब्योरे के साथ डीमैट खाते से जुड़ी जानकारी देनी होगी।

वास्तव में अगर आपकी बात सही साबित होती है तो कंपनी के निदेशक को इस मामले में संलिप्त होने के लिए दंडित किया जा सकता है। मिडास टच इनवेस्टर्स एसोसिएशन के संस्थापक सदस्य और इनवेस्टर हेल्पलाइन प्रोजेक्ट के निदेशक वीरेंद्र जैन ने कहा, 'कंपनी का कोई भी निदेशक अगर जानते-बूझते डिफॉल्ट में शामिल रहा है तो उसे कारावास की सजा हो सकती है जिसकी मियाद तीन साल तक बढ़ाई जा सकती है और उसे डिफॉल्ट होने के समय से 1,000 रुपए प्रतिदिन जुर्माना चुकाना होगा। साथ ही कंपनी को डिफॉल्ट जारी रहने की अवधि के दौरान सालाना 18 फीसदी की दर से ब्याज चुकाना होगा।'

हस्तांतरण से जुड़ी दिक्कत

जो निवेशक शेयरों का हस्तांतरण करते हैं, उन्हें लंबे वक्त तक सर्टिफिकेट ही नहीं मिलते। अगर कंपनी सेक्रेटरी या आरटीए आपको कोई समाधान उपलब्ध नहीं कराता तो आपको डिपॉजिटरी से संपर्क साधने की जरूरत होती है जो कंपनी को सेवाएं मुहैया कराने का जिम्मा संभालता है। हालांकि, जैन ने याद दिलाया कि आपको शेयर ट्रांसफर से जुड़े समझौते की प्रति, हस्तांतरित किए गए शेयर सर्टिफिकेट की प्रति और इस बात के सबूत पेश करने होते हैं कि आपने कंपनी या आरटीए को सभी संबंधित दस्तावेज सौंपे हैं।

हालांकि, उत्तराधिकारी को सौंपने के मामले में आपको इसका सक्सेशन सर्टिफिकेट और एक इनडेमनिटी कम एफिडेविट फॉर्म की जरूरत पड़ती है। याद रखिए कि आपका मामला केवल तभी सही होगा जब आपको आवेदन के शुरुआती पंजीकरण के दो महीने के भीतर सर्टिफिकेट या ट्रांसमिशन सर्टिफिकेशन न मिले हों।

समस्याएं और भी हैं

अगर आपको लगता है कि सावधि जमा या डिबेंचर में निवेश करने से आप ऐसी मुश्किलों से बच सकते हैं तो यह आपका भ्रम है। कई निवेशकों को फिक्स्ड डिपॉजिट और डिबेंचर परिपक्व होने पर भी भुगतान नहीं मिलता। कंपनी सेकेटरी से मिलने के बाद न्यासी से मुलाकात की जा सकती है जिसे सिक्योर्ड डिबेंचर के मामले में नियुक्त किया गया है। इस मामले में कानूनी जरिया उपलब्ध है और कंपनी लॉ बोर्ड को कंपनी को डिपॉजिट का भुगतान करने के निर्देश देने का अधिकार है। कामत ने कहा, 'कई मामलों में कंपनियां इस बात का आवेदन लेकर अपनी जिम्मेदारी पूरी करने से भागती रही हैं कि वे वित्तीय रूप से कमजोर हैं। इस मामले में शेयरधारकों को केवल संपत्तियां भुनाने के वक्त फायदा हो सकता है और प्राथमिकता की सूची में वे अंतिम पायदान पर होते हैं।'

चालबाजों से बचिए

ऐसे भी कई लोग हैं गैर-पंजीकृत ब्रोकरों या सब-ब्रोकरों के चंगुल में फंसकर अपना पैसा गंवा चुके हैं। ऐसे जालसाज आम जनता का पैसा लेकर फरार हो जाते हैं। फर्जीवाड़ों के ऐसे मामले में आपको सेबी को जानकारी देनी होती है जो अदालत में मामला दायर कराने का अधिकार रखता है। हालांकि, अब तक इस तरह के मामलों में सीमित कार्रवाई ही होती देखी गई है। सीयूटीएस सेंटर फॉर कंज्यूमर एक्शन, रिसर्च एंड ट्रेनिंग के प्रोग्राम ऑफिसर दीपक सक्सेना ने कहा, 'काउंटर पार्टी जोखिम से खुद को बचाने के लिए आपको गैर-पंजीकृत मध्यस्थ संस्थाओं से बचना चाहिए। साथ ही अपने ब्रोकर को स्पष्ट दिशानिर्देश दीजिए और ब्रोकर या सब-ब्रोकर को दिए जाने वाले सभी निर्देशों का रिकॉर्ड भी अपने पास रखिए।'

अन्य कठिनाइयां

निवेशकों और शेयर ब्रोकर या डिपॉजिटरी भागीदारों के बीच विवाद समझाने के लिए सेबी के दिशानिर्देशों के आधार पर आर्बिट्रेशन पैनल का गठन किया गया है। सक्सेना ने कहा, 'अगर आप असूचीबद्ध कंपनी के सामने खुद को मुश्किल में फंसा पा रहे हैं या मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों में फिक्स्ड डिपॉजिट से संबंधित समस्या का सामना कर रहे हैं या शेयरों की जब्ती या कंपनी की सालाना रिपोर्ट अब तक न मिलने से परेशान हैं तो आपको कंपनी मामलों के मंत्रालय में कंपनियों के संबंधित रजिस्ट्रार से मिलना होगा।'

आसान समाधान

- शिकायत के साथ कंपनी सेक्रेटरी या रजिस्ट्रार और ट्रांसफर एजेंट से संपर्क साधिए

- अगर समस्या न सुलझे तो सेबी या डीआईएस या कॉरपोरेट मामलों के मंत्रालय का दरवाजा खटखटाइए

- मामले से जुड़े सभी दस्तावेजों की प्रतियां साथ रखना न भूलें

- याद रखें कि कंपनी पर उसकी ओर से देर होने पर ही देनदारी बनती है

- जांचिए कि क्या आप कानूनी जरिया अपना सकते हैं
-लीजा मेरी थॉमसन

बड़े लक्ष्य पूरे करने के लिए वित्तीय योजना जरूरी

नई दिल्ली- क्या आपको लगता है कि आप जीवन में अपने वित्तीय लक्ष्यों को हासिल कर पाएंगे? अगर आप अपने मित्रों या रिश्तेदारों से यह प्रश्न
पूछेंगे तो उनमें से ज्यादातर का जवाब हां में होगा। लेकिन अगर आप फाइनेंशियल एडवाइजर्स से बात करेंगे तो वे आपको बताएंगे कि अधिकतर लोगों के लिए अपने वित्तीय लक्ष्यों को पाना मुश्किल है, फिर चाहे वह रिटायरमेंट हो या बच्चों की शिक्षा। इसका कारण है उनके पास सही वित्तीय योजना का अभाव।

सर्टिफाइड फाइनांशियल प्लानर अमित त्रिवेदी का कहना है, 'ज्यादातर लोग बिना सोचे-समझे निवेश करते हैं। कई बार उनके दिमाग में लक्ष्य भी होता है लेकिन वे उसे पूरा करने की दिशा में प्रयास नहीं करते। बहुत से लोग नियमित अंतराल पर अपने निवेश की समीक्षा नहीं करते। अगर उन्हें लक्ष्यों को पूरा करने के लिए अतिरिक्त निवेश की जरूरत होती है तो भी वे उसके लिए कुछ नहीं करते।'

उदाहरण के तौर पर कुछ लोगों के पास प्रॉविडेंट फंड, फिक्स्ड डिपॉजिट और म्यूचुअल फंड में निवेश होता है और उन्हें लगता है कि जीवन के बहुत से लक्ष्यों को पूरा करने के लिए ये निवेश पर्याप्त रहेगा। लेकिन ऐसा नहीं होता। इसका कारण यह है कि उन्हें यह नहीं पता होता कि बच्चों को उच्च शिक्षा के लिए विदेश भेजने में कितना खर्च होगा या उनके पास कितना निवेश होना चाहिए। त्रिवेदी के अनुसार, 'ऐसे लोग मुद्रास्फीति और रिटर्न की दर के वास्तविक आंकड़ों पर ध्यान नहीं देते। उदाहरण के तौर पर पिछले 15 सालों में शिक्षा पर खर्च काफी बढ़ गया है।' यही वजह है कि वित्तीय सलाहकार लक्ष्यों को हासिल करने के लिए एक अच्छी वित्तीय योजना की जरूरत पर जोर देते हैं।

सर्टिफाइड फाइनेंशियल प्लानर गौरव माशरूवाला का कहना है, 'जीवन में हमारे सामने बहुत सी अप्रत्याशित स्थितियां आ सकती हैं। हमें इनके लिए तैयार रहना चाहिए। इसके लिए पहले से योजना बनाने की जरूरत होती है।' उदाहरण के लिए बच्चों की शिक्षा और रिटायरमेंट जैसे लक्ष्यों के लिए अगर योजना नहीं बनाई जाएगी तो इन्हें पूरा करना मुश्किल होगा।

एक वित्तीय सलाहकार ने अपने एक क्लाइंट का उदाहरण देते हुए बताया, 'मेरे पास एक ऐसे व्यक्ति आए जिन्हें रिटायर हुए कुछ महीने ही बीते थे। वह रिटायरमेंट के लिए काफी पहले से बचत कर रहे थे। लेकिन जब हमने उनकी बचत देखी तो पता चला कि उन्हें अपने खर्चे घटाने की जरूरत है। उन्होंने अपने वेतन के एक बड़े हिस्से की बचत की थी लेकिन बचत का निवेश उन्होंने पीपीएफ और फिक्स्ड डिपॉजिट जैसे सुरक्षित विकल्पों में किया था। इस पर उन्हें साधारण रिटर्न मिला और उनका कोष ज्यादा नहीं बढ़ पाया।' इसका कारण एक वित्तीय योजना का न होना था। अगर उन्होंने वास्तविक स्थिति के अनुसार योजना बनाई होती तो उन्हें इस बात का अनुमान रहता कि रिटायरमेंट के लिए उन्हें कितनी रकम की जरूरत होगी। अगर उन्हें लगता कि कि उनकी रिटायरमेंट की बाद की जरूरतों के लिए पर्याप्त नहीं होगी तो वह बेहतर रिटर्न के लिए इक्विटी में निवेश कर सकते थे।

माशरूवाला का मानना है कि वित्तीय योजना कार चलाकर मंजिल तक पहुंचने जैसी है। उनका कहना है, 'जिस तरह कार के चार टायर होते हैं। उसी तरह जीवन में आमदनी, खर्चे, निवेश और दायित्व जैसी चार बातें बहुत महत्वपूर्ण होती हैं। इन सभी में सामंजस्य बिठाना पड़ता है।' त्रिवेदी के मुताबिक सही वित्तीय योजना से आपको जीवन में किसी भी आकस्मिक स्थिति से निपटने में मदद मिलती है। उन्होंने कहा, 'यह कोई भी समस्या हो सकती है। इसका एक उदाहरण मौजूदा आर्थिक संकट है। अगर आपके पास सही योजना मौजूद है तो आप इससे बेहतर तरीके से निपट सकते हैं।'

प्रॉफिट बुकिंग कर मौजूदा तेजी का लाभ उठाएं

मुंबई - निवेशक पिछले काफी समय से चौथी तिमाही के नतीजों का इंतजार कर रहे थे। नतीजों का दौर शुरू हो चुका है और सेंसेक्स पर इसका नकारात्मक असर नहीं पड़ा है। बहुत से लोगों का मानना है कि निवेशकों को चिंता में डालने वाले नकारात्मक समाचार बहुत अधिक नहीं हैं। इसके बावजूद ब्रोकर और एनालिस्ट निवेशकों को सतर्कता बरतने की सलाह दे रहे हैं क्योंकि जमीनी स्तर पर अर्थव्यवस्था की स्थिति अभी उत्साहजनक नहीं है।
आईटी कंपनियों ने भी चौथी तिमाही के नतीजों के साथ गाइडेंस में कहा है कि आगामी दो तिमाहियां चुनौतीपूर्ण रह सकती हैं। इसे देखते हुए बहुत से लोगों को बाजार में तेजी चौंका रही है। मौजूदा रैली के पीछे एक बड़ा कारण विदेशी संस्थागत निवेशकों ( एफआईआई ) की खरीदारी है। तेजी चुनिंदा शेयरों तक ही सिमटी है। छोटे निवेशक अभी भी बाजार से दूर बनाए हुए हैं। इसका एक बड़ा कारण नई सरकार को लेकर राजनीतिक अनिश्चितता भी है। इसके अलावा बाजार में कारोबार का वॉल्यूम कम होना भी उन्हें चिंता में डाल रहा है।

बाजार के मार्च - अप्रैल के दौरान खराब वित्तीय नतीजों की आशंका से गिरने की आशंका जताई जा रही थी लेकिन ऐसा नहीं हुआ और इसके उलट बाजार में प्रत्येक गिरावट के बाद अच्छा उछाल देखा गया है। मौजूदा रैली के बावजूद निवेशकों को संभल कर आगे बढ़ने की जरूरत है क्योंकि गिरावट का एक और बड़ा दौर आने का अनुमान है।

गिरावट के समय के बारे में कोई भी निश्चित नहीं है लेकिन इसके पक्ष में बहुत से कारण नजर आ रहे हैं। लघु अवधि में आम चुनाव के नतीजे और तिमाही प्रदर्शन बाजार को नीचे ला सकते हैं। बहुत से लोग यह दलील दे सकते हैं कि बाजार में इन दोनों कारणों का असर देखा जा चुका है लेकिन आर्थिक रफ्तार धीमी पड़ने का वास्तविक प्रभाव अगली 2-3 तिमाहियों में ही नजर आएगा। इसे देखते हुए निवेशकों के लिए समय - समय पर प्रॉफिट बुकिंग करना अच्छा होगा। शेयरों के दाम नीचे जाने पर वे खरीदारी भी कर सकते हैं।

लंबी अवधि के निवेशकों के लिए कुछ सेक्टरों में अच्छी संभावनाएं दिख रही हैं। लॉर्ज - कैप शेयरों के अलावा मिड - कैप में भी अच्छे अवसर मौजूद हैं। निवेशक पावर , टेक्नोलॉजी और फार्मा में निवेश पर विचार कर सकते हैं। पिछले कुछ सत्रों में कैपिटल गुड्स और बैंकिंग सेक्टर में तेजी दर्ज की गई है और गिरावट आने की स्थिति में इनमें खरीदारी की जा सकती है। इक्विटी जहां निवेश के लिए काफी आकर्षक नजर आ रही है , वहीं बैंकों द्वारा जमा दरें घटाने से डेट की चमक फीकी पड़ी है। इसकी एक बड़ी वजह डेट से धन निकलकर इक्विटी में जाना भी है। बाजार के सूत्रों का कहना है कि भले ही रीटेल सेक्टर की रफ्तार काफी धीमी है लेकिन इसमें निवेश के लिए बहुत से लोग इंतजार कर रहे हैं।

एक बड़े फंड हाउस के सीईओ ने हाल ही में कहा था कि वैश्विक स्तर पर निवेश के लिए धन की कोई कमी नहीं है लेकिन यह नकारात्मक समाचारों का प्रवाह थमने के बाद ही बाजार में आएगा। ऐसा होने पर घरेलू शेयर बाजारों में समय से पहले तेजी का लंबा दौर आ सकता है।
-श्रीकला भाष्यम