Sunday, November 30, 2008

आइए जानते हैं बायबैक का फंडा

किसी कंपनी के अपने शेयर दोबारा खरीदने के कदम को बायबैक कहा जाता है। ऐसा कर कंपनी खुले बाजार में उपलब्ध अपने शेयरों की संख्या घटाती है। इस कदम से आय प्रति शेयर (ईपीएस) में इजाफा होने के अलावा कंपनी की संपत्ति पर मिलने वाला रिटर्न भी बढ़ता है। इनके असर से कंपनी की बैलेंस शीट भी बेहतर होती है। निवेशक के लिए बायबैक का मतलब है, कंपनी में उसकी हिस्सेदारी बढ़ना। शेयर बायबैक करने को कभी-कभार शेयर खरीदना कहा जाता है और आम तौर पर इसे शेयर की कीमत में उछाल का संकेत माना जाता है।
कैसा होता है बायबैक?
कंपनी टेंडर ऑफर या खुले बाजार में बायबैक से अपने शेयर वापस खरीद सकती है। पहले तरीके में कंपनी शेयरों की उन संख्या से जुड़े ब्योरे के साथ टेंडर ऑफर जारी करती है जिन्हें खरीदने की उसकी योजना है और प्राइस रेंज का संकेत देती है। ऑफर को स्वीकार करने में दिलचस्पी रखने वाले निवेशक को एक आवेदन भरकर जमा कराना होता है, जिसमें इसकी जानकारी होती है कि वह कितने शेयर टेंडर करना चाहता है और वांछित कीमत क्या है। इस फॉर्म को कंपनी के पास वापस भेजना होता है। ज्यादातर मामलों में टेंडर ऑफर बायबैक की कीमत ओपन माकेर्ट में शेयर के दाम से ज्यादा होती है। सेबी के दिशा-निर्देशों के मुताबिक अगर कंपनी आपके शेयरों को स्वीकार करती है तो उसे आपको ऑफर क्लोज होने के 15 दिन के भीतर जानकारी देनी होगी। कंपनी के समक्ष दूसरा रूट यह होगा कि वह सीधे बाजार से धीरे-धीरे शेयरों को खरीदे।
कहां से मिली जानकारी?
बायबैक से जुड़ी तमाम जानकारी स्टॉक एक्सचेंज से मिल सकती है क्योंकि कंपनियों को ऐसे प्रस्तावों के बारे में सूचित करने की जरूरत होती है।
कंपनियां क्यों चुन रही है बायबैक का रास्ता?
इसकी कई वजह हो सकती हैं। कभी-कभी कंपनियां तब बायबैक में शामिल होती हैं जब उन्हें लगता है कि बाजार में शेयरों की कीमत काफी टूट रही है। दूसरे हालात में ज्यादा नकदी का इस्तेमाल कर ऐसा किया जा सकता है। हालांकि ऐसा कोई उदाहरण नहीं दिखता कि कंपनी के टेकओवर से बचने के लिए ऐसा किया गया हो।

कर बचाने वाली योजनाओं में अभी निवेश बेहतर

जीवन में दो चीजें निश्चित होती हैं- मृत्यु और कर। लेकिन हम इन दोनों ही विषयों पर बात करने से बचना चाहते हैं। वर्ष के अंत में निवेश करने के वार्षिक कार्यक्रम में अभी चार महीने से ज्यादा का समय बचा है। लेकिन अगर आप कर बचाने के लिए इक्विटी लिंक्ड सेविंग स्कीम (ईएलएसएस) या यूनिट लिंक्ड सेविंग स्कीम (यूलिप) में निवेश करने के बारे में सोच रहे हैं तो इस समय आपके लिए आकर्षक अवसर उपलब्ध हैं। शेयर बाजारों में गिरावट का दौर चल रहा है और शेयरों के दाम काफी घट गए हैं। पिछले तीन महीनों में म्यूचुअल फंडों के एनएवी में भी काफी गिरावट आई है और कुछ तो 50 फीसदी तक नीचे चले गए हैं। मौजूदा निवेशकों के लिए निश्चित तौर पर यह अच्छी खबर नहीं है लेकिन अगर आप आयकर कानून की धारा 80 सी के तहत निवेश के विकल्पों की तलाश में हैं तो आपके लिए मौजूदा स्तरों पर निवेश का यह बेहतरीन मौका है। शेयर बाजारों में गिरावट का दौर दिसंबर के समाप्त होने की उम्मीद की जा रही है। विश्व के कई देशों में यह महीना वित्त वर्ष की समाप्ति का भी होता है। भारत में भी वित्तीय स्थितियां सुधारने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने बहुत से कदम उठाए हैं। नकद आरक्षी अनुपात (सीआरआर) और वैधानिक तरलता अनुपात (एसएलआर) में कटौती की गई है। देश में तरलता की स्थिति दो से तीन महीनों में सामान्य हो सकती है। केन्द्रीय बैंक दरों में और कटौती कर सकता है जिससे कॉरपोरेट सेक्टर को कर्ज जुटाने में आसानी होगी। इससे घरेलू मांग को भी बढ़ावा मिलेगा। अगर आप ईएलएसएस में अगले दो महीनों में तीन से चार भाग में निवेश की योजना बना रहे हैं तो बाजार के चढ़ने की स्थिति में आपको नुकसान उठाना पड़ सकता है। अगर आप मौजूदा स्तरों पर निवेश करते हैं तो इस समय आप कम दाम पर इक्विटी में धन लगाने के साथ ही कर भी बचा सकते हैं। मार्च तक इंतजार करने से आपको अगले तीन से चार महीने में बाजार में तेजी आने पर नुकसान हो सकता है। ईएलएसएस फंड विशेष ओपन एंडेड इक्विटी फंड होते हैं जिनमें धारा 80 सी के तहत कर लाभ मिलता है। अन्य इक्विटी फंडों में धारा 80 सी के तहत कर लाभ नहीं मिलता। आप ईएलएसएस में वर्ष के किसी भी समय निवेश कर सकते हैं। इसकी लॉक-इन अवधि निवेश उस दिन से शुरू होती है जब आप निवेश करते हैं। अगर आपके पास अभी नकदी मौजूद है तो इसे आप ईएलएसएस में निवेश कर लाभ ले सकते हैं। इससे आप मार्च में कर बचाने के लिए निवेश की चिंता से भी मुक्त हो जाएंगे।

Wednesday, November 26, 2008

बाजार को मत देखिए, कंपनी के प्रदर्शन पर गौर कीजिए

बेंजामिन ग्राहम ने साल 1930 में चले भयंकर संकट के दौर के वक्त कहा था कि निवेशकों को बाजार को देखने की बजाय वैल्यू इनवेस्टिंग की ओर गौर करना चाहिए। इनवेस्टरों को वास्तव में यह देखना चाहिए कि कंपनी की क्या स्थिति है यह कितनी मजबूत है और बुरे वक्त में कंपनी का प्रदर्शन कैसा रहा है। किसी भी निवेशक को कंपनी में निवेश करने से पहले इसके एसेट्स , कर्जों और नकदी जुटाने की क्षमता के बारे में जानकारी जुटानी चाहिए। अगर किसी कंपनी इतनी सस्ती मिल रही हो कि इसकी वैल्यू में इसके कारोबार से निकलने के बाद बेहद कम गिरावट आए तो ऐसी कंपनी को मार्जिन ऑफ सेफ्टी के दायरे में रखना चाहिए। ऐसे में अगर कोई कंपनी इसके बारे में किए गए दावों के बावजूद सस्ती दिखाई दे तो संकट के दौर में निवेशक इस पर दांव लगा सकता है। साथ ही अगर बाजार कंपनी के शेयरों के आकलन में चूक रहा है तो निवेशक इसमें निवेश से काफी मुनाफा कमा सकता है। न्यूयॉर्क टाइम्स में छपे एक हालिया आर्टिकल में वारेन बफेट ने कहा है कि शेयरों में खरीद का यही मौका है और आगे आने वाला वक्त अनिश्चित हो सकता है। साल 1932 की गर्मियां के बारे में उनका कहना है कि शेयरों ने उस दौर में अर्थव्यवस्था में तेजी आने से पहले ही ऊपर चढ़ना शुरू कर दिया था। इस तरह की समानताएं इस वक्त भी दिख रही हैं। हमें इस बात को खंगालने की कोशिश नहीं करनी चाहिए कि बाजार कब तक तेजी की ओर लौटेगा। या कि कब यह बॉटम पर पहुंच जाएगा। निवेशकों को यह समझ लेना चाहिए कि इस बारे में सोचना बेकार है। निवेशकों को देखना चाहिए कि कंपनी की बैलेंस शीट कैसी है। साथ ही बैलेंस शीट प्रक्रिया से यह जानने की कोशिश करनी चाहिए कि कंपनी के शेयरों की क्या कीमत है और सबसे बुरी स्थिति में भी इसके शेयरों की क्या स्थिति हो सकती है। अगर हमारे आकलन इस बारे में इंगित करते हैं कि कंपनी मार्जिन ऑफ सेफ्टी के लिहाज से ठीक है तो हम इसके शेयरों को खरीद सकते हैं। एक आदमी जिसने साल 1933 में जर्मन इंडेक्स फंड में निवेश किया था (इसी साल हिटलर सत्ता में आया था) उसने उसी वक्त बॉन्ड में निवेश में करने वाले एक निवेशक के मुकाबले साल 1955 में काफी बेहतर रिटर्न हासिल किया।
यह रिटर्न ऐसे वक्त में मिले जबकि साल 1939 से लेकर 1945 तक द्वितीय विश्व युद्ध का दौर चला। इक्विटी में दैनिक आधार पर उतार-चढ़ाव पैदा होता है लेकिन इनमें लंबे वक्त में काफी अच्छे रिटर्न मिलते हैं। भारत की जीडीपी के बारे में सबसे नकारात्मक सोच रखने वाले भी मानते हैं कि अगले दो-तीन साल तक छह से सात फीसदी की वृद्धि दर रह सकती है। ऐसी स्थिति में भी देश की जीडीपी वृद्धि दर 15 फीसदी के करीब होगी। और इस स्थिति में घरेलू कॉरपोरेट जगत की बिक्री दर 15 से 20 फीसदी की रफ्तार से आगे बढ़ेगी। यह वृद्धि दर हालांकि हाल के कुछ सालों में रही रफ्तार से कम रहेगी लेकिन इस वक्त जिस तरह के नकारात्मक अनुमान लगाए जा रहे हैं उससे कहीं बेहतर स्थिति हमें देखने को मिलेगी। सबसे बड़ी बात यह है कि निवेशकों को इस वक्त ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है। इस वक्त शेयरों में निवेश को लंबे वक्त के लिहाज से किए जाने की जरूरत है। जैसे ही वित्तीय संकट से फोकस हट कर आशंका किए जा रहे आर्थिक मंदी की ओर होगा इंडस्ट्री के बारे में पिछले कुछ सालों में किए गए अनुमानों की वास्तविकता पर सवाल होने शुरू हो जाएंगे। पिछले कुछ सालों में इक्विटी बाजार का फोकस केवल आमदनी पर रहा है। विश्लेषकों का पूरा ध्यान इस दौरान कंपनी के प्रोफाइल और नुकसान पर रहा है। इनका गौर कंपनी के कैश फ्लो और बैलेंस शीट पर कम ही रहा है। इसके अलावा कंपनी के शेयरों पर भी काफी फोकस रहा है और इस बारे में विश्लेषण करते वक्त कंपनी को दूसरे स्रोतों से मिल रहे वित्त और इनके शेयरों पर पड़ने वाले असर पर ज्यादा गौर नहीं किया गया है।
एसेट मैनेजमेंट इंडस्ट्री में हाल ही में उतरे कई खिलाड़ियों को रेवेन्यू लैस कॉस्ट विश्लेषण काफी आसान और बढ़िया लगता है। तमाम हेज फंड भी इसी पर भरोसा कर चल रहे हैं। हाल के दिनों में निवेशकों ने कंपनी के कैपिटल स्ट्रक्चर और फंडिंग फंडामेंटलों पर ज्यादा गौर करना शुरू कर दिया है। यह एक अच्छी बात है।
-सुदीप बंदोपाध्याय
( लेखक रिलायंस मनी के सीईओ हैं )

डायवर्सिफाइड फंड लगाएंगे नैया पार

बाजार में मंदी के दौर का एक फायदा है कि यह बढ़िया प्रदर्शन करने वाले फंडों को दूसरों की भीड़ से अलग खड़ा कर देता है। बाजार में तेजी के वक्त निवेशकों के लिए काम ज्यादा मुश्किल नहीं होता क्योंकि सप्ताह दर सप्ताह आधार पर उनके सामने अगुवा फंड का नया समूह खड़ा होता है। लंबी अवधि के लिए पैसा लगाने वाले निवेशक छोटी मियाद के विजेताओं की ओर नहीं देखते , लेकिन ऐसे कुछ ही लोग होते हैं जो निरंतरता पर रिटर्न को नजरअंदाज करने में कामयाब होते हैं। बाजार मंदी की गिरफ्त में हो तो निवेशकों के हाथ में पर्याप्त वक्त होता है और वह अपने मुताबिक उसका इस्तेमाल करने की स्वतंत्रता ले सकता है क्योंकि एनएवी ( नेट एसेट वैल्यू ) कुछ ही दिनों में गायब होने वाली चीज नहीं है। अब सवाल यह उठता है कि आप ऐसे वक्त एक फंड का चुनाव कैसे करें , जब सभी फंड पैसा गंवा रहे हों ? अगर आप खेल के कुछ बुनियादी सिद्धांतों पर कायम रहते हैं तो यह काम बहुत मुश्किल नहीं है। मसलन , पोर्टफोलियो के लिए फंड का चुनाव करने से पहले अपने संपत्ति आवंटन पर गौर कीजिए। हालांकि , फंड का चुनाव और संपत्ति आवंटन हमेशा एक - सा नहीं रहता , क्योंकि आपको निरंतर आधार पर निवेश प्रक्रिया की समीक्षा करने की जरूरत होती है। उदाहरण के लिए मौजूदा स्तरों पर इनकम फंड या लिक्विड फंड में पैसा लगाना बेहतर विकल्प साबित हो सकता है , लेकिन ज्यादा लंबे वक्त के लिए नहीं। ब्याज दरों में गिरावट और शेयर बाजारों में उथल - पुथल के इस समय में डेट के जरिए निवेश करना भी आकर्षक दिख रहा है। लंबी अवधि में हालांकि इक्विटी बाजार बेहतर रिटर्न देने का माद्दा रखता है। पोर्टफोलियो के लिए फंड के मिश्रण पर लौटें तो बढ़िया टैक रिकॉर्ड रखने वाले डायवर्सिफाइड फंड पर भरोसा कीजिए। रिटर्न के ट्रैक रेकॉर्ड के अलावा फंड के निवेश के तरीके पर भी गौर कीजिए। मसलन , वैल्यू पिकिंग एक ऐसा टर्म है जिसे अपनाते सभी फंड हाउस हैं लेकिन इसके सिद्धांत पर चलने वाले फंड हाउस कम ही हैं।
इस साल की शुरुआत में वैल्यू इनवेस्टमेंट रणनीति रखने वाले फंड हाउस 50 से ज्यादा पीई रखने वाले रियल्टी स्टॉक या पावर सेक्टर के शेयरों के पीछे भागते देखे गए थे। एक बढ़िया म्यूचुअल फंड पोर्टफोलियो में निवेश की जोखिम सहन करने की क्षमता का अक्स नजर आना चाहिए इसलिए इसका कोई एक फॉर्मूला नहीं हो सकता। हालांकि बाजार की मौजूदा स्थिति में निवेशक लार्ज कैप आवंटन को लेकर जेब का दरवाजा खोल सकते है। डायवर्सिफाइड फंड लार्ज कैप शेयरों पर स्वाभाविक फोकस रखते हैं , इसलिए इन फंड में ज्यादा पैसा लगाना जरूरी हो जाता है। फंड चुनते वक्त पोर्टफोलियो को मिश्रित रूप से तैयार करने पर विचार कीजिए। एक जैसा स्टॉक पोर्टफोलियो रखने वाले कई सारे फंड भी डायवर्सफिकेशन का उद्देश्य पूरा नहीं करते। यहां , निवेशकों को विश्लेषण संबंधी कौशल का इस्तेमाल करना चाहिए और अगर आवश्यकता पड़े तो प्रोफेशनल की मदद लेने से भी नहीं हिचकिचाना चाहिए। बाजार की कमजोरी ने मिड कैप शेयरों की चमक पर चोट की है लेकिन अपनी रकम का 10-15 फीसदी हिस्सा इन फंड में लगाना लंबी अवधि में बढ़िया रणनीति साबित हो सकता है। हालांकि आपको मिड कैप फंड चुनते वक्त काफी सतर्कता बरतने की जरूरत होती है क्योंकि उनका प्रदर्शन अलग - अलग फंड में अलग - अलग होता है। बीते 12-24 सालों में कई फंड हाउस ने मिड कैप स्टॉक पर फोकस करने वाले फंड लॉन्च किए हैं लेकिन इनमें से कुछ ही कामयाब ही हुए।
-श्रीकला भाष्यम

वैल्यू इनवेस्टिंग है आज के दौर का मंत्र

इक्विटी में पैसा लगाने वाले लोग पहली बार इस तरह के हालात का सामना कर रहे हैं। इस बात पर गौर कीजिए कि अतीत में क्या कहा गया था और किस तरह 2008 की मुश्किल घड़ी ने उस वक्त दी गई सलाह के पीछे के सिद्धांत को एक बार फिर सही ठहराया है। पेश है ऐसे कुछ सिद्धांत जो कभी नहीं बदलते। जिस किसी निवेशक ने इस सलाह पर अमल किया था, वह आज के हालात में भी बढ़िया स्थिति में है। आपके निवेश की मार्केट वैल्यू भले आज नीचे हो, लेकिन अगर आपको इस रकम की जरूरत आने वाले वर्षों में नहीं पड़ने वाली तो इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। फिलहाल आपको इस पैसे की जरूरत नहीं है, इसलिए निवेश बढ़ाने का यह एक और मौका हो सकता है। हम जो कह रहे हैं, उस पर ज्यादातर निवेशकों की स्वाभाविक प्रतिक्रिया है कि गिरावट में उन्होंने पैसा खोया है। वे कह रहे हैं, 'भविष्य में रिटर्न मिल सकता है, लेकिन उस नुकसान का क्या जो हम आज उठा रहे हैं।' जो लोग ऐसा कह रहे हैं, वे अंकगणित में सही हो सकते हैं, लेकिन भविष्य को लेकर उनकी आशंका सही नहीं है। निवेश के जिस नजरिए की वकालत हम कर रहे हैं, वह भविष्य की ओर देखने की बात कहता है।
इतिहास ने किया साबित
अगर आपने 1997 की शुरुआत में सेंसेक्स आधारित इंडेक्स फंड में हर महीने 20,000 रुपए निवेश करना शुरू किया था और बाजार में उतार-चढ़ाव के बावजूद इसे जारी रखा तो आज आपको सालाना 14 फीसदी रिटर्न हासिल हुआ होता। 1997 से लेकर अब तक इस हिसाब से आपने 28.6 लाख रुपए निवेश किए और आज आपकी यह रकम 66 लाख रुपए हो गई होती। इक्विटी से यह रिटर्न बाजार की मौजूदा तबाही के बावजूद आपको हासिल हुआ होता। इस दौरान कई म्यूचुअल फंड ने सेंसेक्स को भी पीछे छोड़ा है। इस हिसाब से अगर आपने मीडियम फंड में हर महीने 20,000 रुपए निवेश किया होता तो 10 साल में आपकी कुल रकम 1.04 करोड़ रुपए हो गई होती। यह बात और है कि इस दौरान शेयर बाजार ने दो बड़ी गिरावट देखी है। इसमें मौजूदा गिरावट भी शामिल है। आज बाजार लंबी अवधि के निचले स्तर पर है। बाजार जब वापसी करेगा तो आपको बेहतर रिटर्न मिलेंगे। लंबी मियाद में निवेश के तथाकथित 'सुरक्षित' फिक्स्ड इनकम माध्यमों ने 'असुरक्षित' समझे जाने वाले इक्विटी से भी बदतर प्रदर्शन किया। इसलिए इन दोनों के बीच कहीं कोई मुकाबला नहीं है। 1997 से अब तक अगर आपने फिक्स्ड इनकम विकल्पों में पैसा लगाया होता तो आपको सालाना आठ फीसदी से ज्यादा रिटर्न नहीं मिलता। यानी 10 साल तक हर महीने 20,000 रुपए का इन विकल्पों में निवेश करने पर आज आपकी कुल रकम करीब 44 लाख रुपए होती।
गिरावट आपका दोस्त
आप गिरावट के बावजूद कैसे पैसा बनाने में कामयाब हो सकते हैं? इसका जवाब उन लोगों के लिए आसान है जो इस बात से वाकिफ हैं कि यहां चल रही गतिविधियों का गणित वास्तव में क्या है। बाजार में गिरावट से आपको सस्ते स्तरों पर खरीदारी का मौका मिलता है और आपका कुल रिटर्न बढ़ता है। अगर आप धीमी रफ्तार से लंबी मियाद में पैसा लगा रहे हैं तो बीच में आने वाली गिरावटों से आपको ज्यादा मुनाफा कमाने में मदद मिलती है न कि कम। इसी तरह 2008 की गिरावट से भी आखिरकार मुनाफा ही होगा। शेयर अब सस्ते हैं और संभवत: और सस्ते हो सकते हैं। यह गिरावट जितनी गहरी और लंबी होगी, आप उतना ज्यादा फायदा इससे कमा सकते हैं। अगर आप यह जानते हैं कि आपके लिए सही क्या है तो आपको सेंसेक्स के 6,000 या 7,000 तक लुढ़कने और कुछ महीनों या साल तक मंदी के बने रहने की दुआ करनी चाहिए। इक्विटी इनवेस्टिंग का सीक्रेट भी यही है और कहानी का असल निचोड़ भी।
- धीरेन्द्र कुमार

Saturday, November 22, 2008

क्या निवेश सम्राट वारेन बफे का जादू खत्म हुआ



न्यूयॉर्क: अमेरिका के सबसे रईस और शेयर मार्केट में पैसा कमाने के सबसे बड़े जादूगर माने जाने वाले वारेन बफे को क्या हो गया है? क्या अब शेयर बा
जार की चाल पहचानने में वो चूक करने लगे हैं! दुनिया भर और खासकर अमेरिकी इनवेस्टर और आम लोगों के जहन में ये सवाल अब उठने लगे हैं। Tech बबल के समय भी बफे के कुछ इनवेस्टमेंट फैसले गलत साबित हुए थे। लेकिन अब तक कुल मिलाकर बफे को सही समय पर बाजार में घुसने और निकलने की कला के कारण जाना जाता है। वारेन बफे की कंपनी बर्कशायर हैथवे की हालत अब खराब हो चली है। इस तरह के भी सवाल पूछे जाने लगे हैं कि शेयर बाजार का ये बाजीगर क्या अपनी कंपनी के कर्ज चुका पाएगा। हैथवे के शेयर दिसंबर के ऊंचे लेवल से 50 परसेंट गिर चुके हैं। हैथवे पर सबसे बुरी मार इंश्योरेंस सेक्टर से आ रहे कम रिटर्न की वजह से पड़ी है। इस बीच कंपनी की क्रेडिट रेटिंग AAA से घटकर BBB हो चुकी है। बर्कशायर हैथवे सुनहरे रिटर्न देने वाली कंपनी मानी जाती है। इसके लगभग 80 बिजनेस हैं, जिनमें कार इंश्योरेंस, क्लोदिंग, फूड, किचन के सामान, और कंस्ट्रक्शन शामिल हैं। इसके अलावा बर्कशायर के पास कई कंपनियों के अरबों डॉलर के स्टाक्स हैं। दरअसल, बर्कशायर की पूंजी इतने क्षेत्रों में लगी है कि किसी एक सेक्टर में आई गिरावट से उसे खास फर्क नहीं आएगा। लेकिन इस समय तो लगभग हर सेक्टर में मंदी है और बर्कशायर पर उसका असर दिख रहा है। बफे की कंपनी का स्टॉक मार्केट में 76 अरब डॉलर का इनवेस्टमेंट हैं। जिन कंपनियों में बफे का पैसा लगा है, उनमें अमेरिकन एक्सप्रेस, कोका कोला, प्रॉक्टर एंड गैंबल और वेल्स फार्गे शामिल हैं। बफे ने पिछले कुछ महीनों में जनरल इलेक्ट्रिक और गोल्डमैन सैक्स में 8 अरब डॉलर के प्रेफर्ड शेयर खरीदे थे। निवेशक अब बफे के उस फैसले पर सवाल उठा रहे हैं, क्योंकि दोनों कंपनियों के शेयर अब काफी नीचे चल रहे हैं। बर्कशायर क्लास ए के शेयर इस समय 2003 के बाद के लोएस्ट लेवल पर हैं। इस साल दिसंबर 11 को ये स्टॉक 1,51,650 डॉलर के लेवल पर था। अब ये 74,100 डॉलर पर पहुंच गया है। ये न्यूयॉर्क स्टॉक्स एक्सचेंज का सबसे महंगा शेयर है। बर्कशायर ने 7 नवंबर को कहा था कि तीसरी तिमाही में उसका प्रॉफिट 77 परसेंट कम हो गया है। कंपनी ने लगातार चौथी तिमाही में गिरावट दिखाई है। अगर अमेरिकी शेयर बाजार नहीं सुधरता है तो 2019 से लेकर 2027 के बीच बर्कशायर को 37.4 अरब डॉलर चुकाने पड़ सकते हैं। ऐसा इसलिए है क्योंकि बफे ने कुछ डेरिवेटिव कॉन्ट्रेक्ट ऊंचे रेट पर किए थे। लेकिन बफे को लेकर हर कोई निराश नहीं है। लोगों को उम्मीद है कि बफे सही समय पर सही कारोबारी फैसले कर फिर से चांदी काटेंगे। कई इंश्योरेंस कंपनियां बैंकिंग कंपनी बनने की फिराक में हैं ताकि उन्हें यूएस सरकार के 700 अरब डॉलर के बेलआउट प्लान का फायदा मिल सके। इन कंपनियों में लगा बफे का पैसा फिर जादू कर सकता है।

बाजार में रहेगा आशावादी रुझान - सुदीप बंदोपाध्याय

हाल में बीजिंग में हुई एशिया-यूरोप बैठक में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था, 'ग्लोबलाइजेशन के इस युग में हमारी अर्थव्यवस्था ग्लोबल है लेकिन इसके प्रभावी गवर्नेंस के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर की व्यवस्था नहीं है।' वास्तव में प्रधानमंत्री इस तथ्य की ओर सबका ध्यान आकर्षित कराना चाहते थे कि दुर्भाग्य से पूरी दुनिया के लिए कोई अंतरराष्ट्रीय स्तर का वित्तीय नियामक नहीं है। अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संकट ने दुनिया भर की अर्थव्यवस्थाओं की नियति को एक-दूसरे से जोड़ दिया है। आर्थिक मसलों पर बहुपक्षीय रवैये का फायदा साफ हो गया है, लेकिन ग्लोबलाइजेशन से परस्पर नुकसान की भी संभावना रहती है। इस बार का संकट अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के लिए एक सही अवसर है कि वह अपनी राह बना सके। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वित्तीय स्थिरता को बढ़ावा देने के लिए व्यापक अधिकारों वाले एक मजबूत बहुपक्षीय संस्थान समय की जरूरत है। इस भूमिका में आने के लिए आईएमएफ को अपने स्वरूप में क्रांतिकारी बदलाव लाना होगा। अभी आईएमएफ को दो बड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। पहला, अंतरराष्ट्रीय पूंजी प्रवाह के आकार की तुलना में आईएमएम का पूंजी आधार बहुत छोटा है जिससे इसकी प्रभावशीलता घटती जा रही है। ऐसी दुनिया में जहां 700 अरब डॉलर का राहत पैकेज दिया जा रहा हो और विभिन्न देशों में कई लाख करोड़ डॉलर की पूंजी का आवागमन हो रहा हो, आईएमएफ की 250 अरब डॉलर की कर्ज देने की क्षमता कोई खास मायने नहीं रखती। डांवाडोल अंतरराष्ट्रीय वित्त व्यवस्था को आगे संभालने के लिए एक अंतरराष्ट्रीय केंद्रीय बैंक की जरूरत है। इस बैंक को कई तरह के महत्चपूर्ण काम सौंपे जा सकते हैं। यह सभी ऐसी बड़ी अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाओं का शीर्ष रेगुलेटर हो सकता है, जिनकी गतिविधियां कई देशों में होती हैं। यह अंतरराष्ट्रीय बाजार में पैदा होने वाली किसी भी तरह की जोखिम पर नजर रख सकता है और तत्काल चेतावनी जारी करने की व्यवस्था कर सकता है जिससे बैंकों और राष्ट्रीय नियामकों को इस बात का आभास हो जाए कि संकट आने वाला है। इससे नियामक सचेत होकर अपनी नीतियों में फेरबदल कर सकेंगे ताकि उनका देश संकट से कम से कम प्रभावित हो। पिछले हफ्ते के शुरुआती दिनों में शेयर बाजारों में तेजी देखी गई, इसकी खास तौर से वजह यह रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के संतोषजनक परिणाम देखकर अंतरराष्ट्रीय बाजारों से सकारात्मक संकेत मिले। इसमें उत्साह बढ़ाने वाली और बात यह रही कि दुनिया के कई केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरें घटाई हैं। भारतीय बाजारों में पीएसयू और निजी दोनों तरह के बैंकों ने ब्याज दरों में 50 से 75 बेसिस प्वाइंट की कटौती करने की घोषणा की है। ब्याज दरें घटाने का कदम स्वागत योग्य है क्योंकि इससे निश्चित रूप से मनोदशा सुधरेगी और विकास को बढ़ावा मिलेगा। देश में महंगाई की दर थोड़ी बढ़कर 10.52 फीसदी तक हो गई है। लेकिन यह कोई चिंता की बात नहीं है क्योंकि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कमोडिटी और तेल की कीमतों में लगातार गिरावट हो रही है जिससे अगले हफ्तों में महंगाई के नीचे की ओर जाने की ही उम्मीद है। इस हफ्ते में बाजार में खरीद-फरोख्त बढ़ेगी और कई तरह की गतिविधियां देखी जाएंगी। भारतीय बाजार की मजबूती इस बात से ही प्रकट होती है कि देश का आर्थिक प्रशासन सामने आने वाली समस्याओं का तत्परता से समाधान करता है और स्थिति को सामान्य बनाने के लिए सक्रिय कदम उठा रहा है। वित्तीय प्रणाली में तरलता की बहाली के लिए जो उपाय किये गए हैं उनसे कर्ज लेनदेन की गतिविधियां बढ़ेंगी और बाजार को सकारात्मक संकेत मिलेगा। ( लेखक रिलायंस मनी के सीईओ हैं)