Monday, May 4, 2009

क्या है एनआरआई/एनआरओ अकाउंट?

एनआरई/एनआरओ अकाउंट

सरकार प्रवासी भारतीयों यानी एनआरआई को विदेश से यहां रुपया-पैसा भेजने के लिए खाता खोलने की सहूलियत देती है। इनमें एनआरई और एनआरओ एकाउंट सबसे लोकप्रिय हैं।

आइए इन एनआरआई खातों के बारे में विस्तार से जानते हैं। एनआरई (नॉन रेजिडेंट एक्सटर्नल) खाते विदेश में कमाई रकम भारत भेजने में एनआरआई के खासे मददगार साबित हैं। ये खाते चालू, बचत या सावधि जमा खाते हो सकते हैं। ऐसे खाते को खाताधारक के अलावा निवासी भारतीय भी चला सकता है। निवासी भारतीय देश में स्थानीय मुदा में पैसा जमा कर सकता है। लेकिन इसके लिए उसके पास पावर ऑफ अटॉर्नी होना जरूरी है।

एनआरओ (नॉन रेजिडेंट ऑर्डिनरी) खाता खोलने पर खाताधारक को देश-विदेश दोनों में कमाई गई रकम जमा करने की सुविधा मिलती है। एनआरओ खाता भी एनआरई की तरह चालू, बचत या सावधि जमा खाता हो सकता है। लेकिन इसके लिए संयुक्त खाताधारक का भारतीय निवासी होना जरूरी है। इस खाते में विदेशी मुद्रा में हुई कमाई, प्रॉपर बैंकिंग चैनल या एनआरई खाते से हासिल रेमिटेंस या भारत से हासिल पुराना बकाया जमा किया जा सकता है। इस खाते में जमा हुई रकम का इस्तेमाल भारत में भुगतान या निवेश में ही किया जा सकता है।

एनआरई या एनआरओ खाता कैसे खोला जा सकता है?

दोनों खाते खोलने का एक ही तरीका है। इसके लिए एनआरआई को किसी अधिकृत बैंक में आवेदन करना होगा। इसके बाद उन्हें बिजली, पानी, टेलिफोन जैसे बिल, ड्राइविंग लाइसेंस, रेजिडेंट परमिट, प्राप्त किराया, पासपोर्ट, विदेशी या भारतीय बैंक के स्टेटमेंट जैसे दस्तावेज जमा कराने होंगे। साथ ही इसमें फॉरेक्स रेमिटेंस या एनआरई खाते से ट्रांसफर के जरिए न्यूनतम राशि जमा कराना जरूरी है।

एनआरई या एनआरओ खातों में क्या अंतर है?

एनआरई खाता विदेश से हासिल कमाई को जमा कराने के लिए होता है। एनआरओ में भारत में हुई कमाई जमा की जा सकती है। एनआरई में सिर्फ एनआरआई संयुक्त खाताधारक हो सकते हैं। एनआरओ में संयुक्त खाताधारक निवासी या अनिवासी भारतीय हो सकता है। एनआरई खाते में जमा रकम एनआरओ में ट्रांसफर की जा सकती है लेकिन एनआरओ से एनआरई में फंड ट्रांसफर नहीं हो सकता।

एनआरई से समूचे मूलधन की निकासी की जा सकती है लेकिन एनआरओ में यह संभव नहीं। एनआरओ में जमा मूलधन का इस्तेमाल सिर्फ स्थानीय भुगतान में हो सकता है। लेकिन दोनों खातों में जमा रकम पर मिले ब्याज को खाताधारक कहीं भी ले जाने को आजाद है। एनआरओ खाते से सालभर में 10 लाख डॉलर की निकासी की जा सकती है। एनआरओ खाते में जमा रकम पर ब्याज भारत में करयोग्य है लेकिन एनआरई खाते के साथ ऐसा कुछ नहीं है।

एनआरई खाते का क्या नफा और नुकसान है?

इस खाते में जमा रकम पर मिलने वाला ब्याज भारत में करमुक्त होता है। खाते में बची रकम पर संपत्ति कर नहीं लगता। इस खाते की रकम से खरीदे उपहार पर भी कर नहीं लगता। इस खाते का सबसे बड़ा नुकसान करेंसी रिस्क यानी विनिमय दर से जुड़ा जोखिम है। इसमें जमा रकम पर एनआरओ खाते के मुकाबले कम ब्याज मिलता है।

क्या है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश/ FDI?

क्या है प्रत्यक्ष विदेशी निवेश / FDI?

सामान्य शब्दों में किसी एक देश की कंपनी का दूसरे देश में किया गया निवेश प्रत्यक्ष विदेशी निवेश यानी एफडीआई कहलाता है। ऐसे निवेश से निवेशकों को दूसरे देश की उस कंपनी के प्रबंधन में कुछ हिस्सा हासिल हो जाता है जिसमें उसका पैसा लगता है। आमतौर पर माना यह जाता है कि किसी निवेश को एफडीआई का दर्जा दिलाने के लिए कम-से-कम कंपनी में विदेशी निवेशक को 10 फीसदी शेयर खरीदना पड़ता है। इसके साथ उसे निवेश वाली कंपनी में मताधिकार भी हासिल करना पड़ता है।

एफडीआई दो तरह के हो सकते हैं-इनवार्ड और आउटवार्ड। इनवार्ड एफडीआई में विदेशी निवेशक भारत में कंपनी शुरू कर यहां के बाजार में प्रवेश कर सकता है। इसके लिए वह किसी भारतीय कंपनी के साथ संयुक्त उद्यम बना सकता है या पूर्ण स्वामित्व वाली सहायक कंपनी यानी सब्सिडियरी शुरू कर सकता है। अगर वह ऐसा नहीं करना चाहता तो यहां इकाई का विदेशी कंपनी का दर्जा बरकरार रखते हुए भारत में संपर्क, परियोजना या शाखा कार्यालय खोल सकता है। आमतौर पर यह भी उम्मीद की जाती है कि एफडीआई निवेशक का दीर्घावधि निवेश होगा। इसमें उनका वित्त के अलावा दूसरी तरह का भी योगदान होगा।

एफडीआई के क्या फायदे हैं?

एफडीआई से विदेशी निवेशक और निवेश हासिल करने वाला देश, दोनों को फायदा होता है। निवेशक को यह नए बाजार में प्रवेश करने और मुनाफा कमाने का मौका देता है। विदेशी निवेशकों को टैक्स छूट, आसान नियमों, लोन पर कम ब्याज दरों और बहुत सी बातों से लुभाया जाता है। एफडीआई से घरेलू अर्थव्यवस्था में नई पूंजी, नई प्रौद्योगिकी आती है और रोजगार के मौके बढ़ते हैं और इस तरह के बहुत से फायदे होते हैं।

क्या देश में एफडीआई संबंधी खास नियम कानून हैं?

सरकार ने एफडीआई के लिए सेक्टर विशेष और कारोबारी गतिविधियों की प्रकृति के हिसाब से नियम बनाए हुए हैं। उदाहरण के लिए, हीरे और बहुमूल्य पत्थरों के उत्खनन (माइनिंग) में एफडीआई के लिए सरकार से पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। इसमें रिजर्व बैंक को निवेश की रकम हासिल होने के 30 दिन के भीतर एक अधिसूचना भेजनी पड़ती है। इसके साथ ही संबंधित दस्तावेज विदेशी निवेशक को शेयर जारी किए जाने के 30 दिन के भीतर सौंपना पड़ता है। प्रसारण जैसे क्षेत्र में एफडीआई के लिए विदेशी निवेश संवर्धन बोर्ड (एफआईपीबी) से मंजूरी लेनी पड़ती है। कुछ खास क्षेत्रों में विदेशी निवेश की ऊपरी सीमा को लेकर भी कुछ नियम लागू हैं। निवेश के ये नियम एफडीआई और एफआईआई दोनों पर लागू होते हैं।

एफडीआई और एफआईआई निवेश में क्या अंतर है?

एफडीआई में किसी विदेशी कंपनी द्वारा देश में प्रत्यक्ष निवेश होता है जबकि एफआईआई यानी विदेशी संस्थागत निवेशक शेयरों, म्यूचुअल फंड में निवेश करते हैं। एफआईआई पार्टिसिपेटरी नोट, सरकारी प्रतिभूतियों, कमर्शियल पेपर वगैरह को निवेश माध्यम बनाते हैं। ज्यादातर एफडीआई की प्रकृति स्थायी होती है लेकिन बाजार में उथल-पुथल की स्थिति बनने पर एफआईआई जल्दी से बिकवाली कर निकल जाते हैं।

आपके निवेश पर भी पड़ता है तिमाही नतीजों का असर

कंपनियों के तिमाही नतीजे घोषित करने का समय फिर आ गया है। इस बार सिंतबर - दिसंबर की तीसरी तिमाही का बही - खाता पेश किया जा रहा है। वित्त वर्ष की तीन तिमाहियां बीत चुकी हैं और इस बार के नतीजे 2008- 09 में कंपनियों की आर्थिक स्थिति का स्पष्ट संकेत देंगे। विश्लेषक और निवेशक इनकी बेसब्री से प्रतीक्षा कर रहे हैं क्योंकि कॉरपोरेट जगत पर मंदी के असर की जानकारी इनसे मिलेगी।

मंदी की मार लगभग सभी जगह देखी जा रही है और इस बार कंपनियों की आमदनी पर इसका असर नजर आ सकता है। इसके साथ ही यह भी पता चलेगा कि चुनौती के समय में प्रबंधन ने कितनी कुशलता से कारोबार को आगे बढ़ाया है।

क्या होते हैं तिमाही नतीजे ?

तिमाही नतीजों के जरिए कंपनियां तीन महीनों के अपने प्रदर्शन की रिपोर्ट पेश करती हैं। स्टॉक एक्सचेंजों के साथ लिस्टिंग समझौते के तहत नतीजों की घोषणा करना कंपनियों के लिए जरूरी होता है। ये नतीजे जनवरी , अप्रैल , जुलाई और अक्टूबर में सार्वजनिक किए जाते हैं।

तिमाही आमदनी की घोषणाओं में आमतौर पर गैर ऑडिटेड वित्तीय नतीजे , तिमाही में कारोबार की स्थितियां और भविष्य में कारोबारी संभावनाओं का जिक्र होता है। आमदनी की रिपोर्ट में शुद्ध आय , प्रति शेयर आय , जारी कारोबार से आमदनी और शुद्ध बिक्री जैसी मद शामिल होती हैं। इससे कंपनी की वित्तीय स्थिति और कारोबारी माहौल को समझने में मदद मिलती है। निवेशकों को याद रखना चाहिए कि गैर ऑडिटेड आंकड़ों में वर्ष के अंत में कुछ बदलाव हो सकता है।

अगली तिमाहियों के अनुमान

कुछ कंपनियां इन नतीजों के साथ भविष्य के लिए अपने अनुमान भी जाहिर करती हैं। इन्हें गाइडेंस कहा जाता है। यह अगली तिमाही और वित्त वर्ष के लिए कारोबार के बारे में प्रबंधन का अनुमान होता है। कंपनी से वित्तीय उम्मीदें तय करने के लिए गाइडेंस महत्वपूर्ण होती है। अगर कंपनी की पिछली गाइडेंस और तिमाही नतीजे मेल खाते हैं तो इससे प्रबंधन की कुशलता का पता चलता है।

अगर कंपनी के अनुमान और उसके नतीजों में बड़ा अंतर होता है तो इसका मतलब है कि प्रबंधन पर आप आगे भी ज्यादा भरोसा नहीं कर सकते। इन्हीं अनुमानों के आधार पर छोटी अवधि के निवेशक कई बार किसी कंपनी के शेयर खरीदने या बेचने का फैसला भी करते हैं।

कंपनी के प्रदर्शन का अक्स

तिमाही नतीजे कंपनी के प्रदर्शन का बड़ा संकेत देते हैं। इसी वजह से विश्लेषक और निवेशक इनका इंतजार करते हैं। आमतौर पर विश्लेषक अनुमानों के आधार पर अपनी उम्मीदें जाहिर करते हैं। इन सभी अनुमानों को मिलाकर कंपनी के प्रदर्शन को देखा जाता है।

सच्चाई यह है कि आमदनी का अनुमान लगाना बहुत मुश्किल होता है। कंपनी की आय को लेकर ब्रोकरेज हाउस के अनुमान हकीकत से कुछ अधिक हो सकते हैं। कंपनियों के लिए खुद भी इनकी सही भविष्यवाणी करना आसान नहीं होता।

नतीजों के सीजन के लिए निवेश की रणनीति

कंपनियों के नतीजे आने के साथ ही उनके शेयर के दाम पर भी इनका असर दिखने लगता है। अगर नतीजे उम्मीद से बेहतर रहते हैं तो शेयर की कीमत चढ़ती है लेकिन अगर ये अनुमानों से कम या करीब रहते हैं तो इनमें गिरावट भी आ सकती है। अगर किसी कंपनी के आंकड़े लगातार कई तिमाहियों तक उम्मीद से कम रहते हैं तो हो सकता है कि कंपनी समस्याओं का सामना कर रही हो। लघु अवधि के निवेशक तिमाही नतीजों के आधार पर निवेश की रणनीति तैयार कर सकते हैं।

लंबी अवधि के निवेशक इन्हें देखकर यह अंदाज लगा सकते हैं कि उनकी कंपनी कैसा कारोबार कर रही है। किसी शेयर को आंकने के लिए उसके पिछले नतीजों को देखना भी जरूरी होता है। अगर प्रबंधन ने वर्ष की अपनी कारोबारी योजना का खुलासा पहले ही कर दिया है तो तिमाही नतीजों से निवेशक को यह पता चलता है कि योजना किस दिशा में और कितनी गति से बढ़ रही है।

निवेशकों को यह भी देखना चाहिए कि कहीं कंपनी ने आंकड़ों में कोई हेरफेर तो नहीं की है। उदाहरण के लिए कोई कंपनी मौजूदा तिमाही की आमदनी को जोड़कर उससे जुड़े खर्चों को अगली तिमाही में दिखाने के साथ अपना अधिक मुनाफा दिखाने की कोशिश कर सकती है। इसके अलावा वह अनुमानों पर पूरा उतरने के लिए तिमाही के अंत में उत्पादों को कम दाम पर भी बेच सकती है। ऐसा होने से कंपनी के वास्तविक प्रदर्शन का संकेत मिल पाना बहुत मुश्किल हो जाता है।

निवेशकों को तिमाही आंकड़ों की जानकारी अखबारों , बिजनेस चैनलों और कंपनी की वेबसाइट पर मिल सकती है।

क्यूआईपी क्या है?

क्यूआईपी के तहत कोई भी सूचीबद्ध कंपनी अपने शेयर, पूर्ण या आंशिक कंवर्टिबल डिबेंचर्स या फिर वारंट से इतर प्रतिभूति जारी करती है। इन्हें बाद में शेयरों में तब्दील किया जा सकता है, लेकिन क्यूआईपी केवल योग्य संस्थागत खरीदार यानी क्वॉलिफाइड इंस्टीट्यूशनल बायर (क्यूआईबी) के लिए ही होता है। क्यूआईपी कुछ खास लोगों या समूह को शेयर देने का एक जरिया होता है। हालांकि यह तरजीही शेयर देने के तरीके से अलग है। शेयर जारी करने की दूसरी विधियों के मुकाबले क्यूआईपी आसान होता है। इसमें बहुत अधिक औपचारिकताएं नहीं होतीं। इसे जारी करने के पहले सेबी को सूचना नहीं देनी पड़ती।

इसकी शुरुआत क्यों हुई?

साल 2006 में बाजार नियामक सेबी ने क्यूआईपी पेश किया था। इसके पहले सूचीबद्ध भारतीय कंपनियां विदेशी पूंजी पर बहुत अधिक निर्भर थीं। असल में भारतीय कंपनियों को घरेलू बाजार से पूंजी जुटाने में कई दिक्कतें होती थीं। वे पैसा जुटाने के लिए विदेशी मुद्रा परिवर्तनीय बॉन्ड (एफसीसीबी) और ग्लोबल डिपॉजिटरी रिसीट्स (जीडीआर) पर निर्भर थे। इस निर्भरता को कम करने या फिर रोकने के लिए सेबी ने क्यूआईपी की पेशकश की।

क्यूआईपी से संबंधित नियम-कानून कौन-कौन से हैं?

क्यूआईपी जारी करने के लिए कंपनी को कुछ कसौटियों पर खरा उतरना होता है। कंपनी का सूचीबद्ध होना इसकी पहली जरूरत है। दूसरा, कंपनी के शेयर आम निवेशकों के पास होने चाहिए। इसकी मात्रा सूचीबद्ध होने के दौरान होने वाले समझौते में तय किया जाता है। साथ ही कंपनी को क्यूआईपी लाने के दौरान कम से कम 10 फीसदी प्रतिभूतियां म्यूचुअल फंड योजनाओं के तहत जारी करना पड़ता है। यदि इश्यू का आकार 250 करोड़ रुपए तक है तो खरीदारों को संख्या कम से कम दो होनी चाहिए। यदि इश्यू का आकार 250 करोड़ रुपए से ज्यादा का है तो खरीदारों की संख्या 5 होनी चाहिए। कोई भी एक खरीदार इश्यू के मूल्य के 50 फीसदी से ज्यादा की खरीदारी नहीं कर सकता। साथ ही ऐसे किसी क्यूआईबी को इश्यू आवंटित नहीं किया जा सकता जो कंपनी के किसी भी प्रमोटर से संबंधित हो।

पिछले दिनों क्यूआईपी चर्चा में क्यों रहा?

रियल एस्टेट कंपनी यूनिटेक ने पिछले दिनों क्यूआईपी जारी किया था। यूनिटेक को पैसे की जरूरत थी। कंपनी ने क्यूआईपी के जरिए 1,620 करोड़ रुपए जुटाए। कंपनी में प्रमोटरों की हिस्सेदारी घटकर 51 फीसदी हो चली है। पिछले दिनों यह भी चर्चा थी कि एलआईसी हाउसिंग फाइनेंस भी क्यूआईपी जारी करने पर विचार कर रही है।

प्राइस अर्निंग रेश्यो क्या है?

मूल्य - आय ( पीई ) अनुपात क्या है ?

मूल्य अनुपात यानी प्राइस अर्निंग ( पीई ) अनुपात। यह दरअसल किसी भी शेयर का वैल्यूएशन जानने के लिए सबसे प्राथमिक स्तर का मानक है। दूसरे शब्दों में इसे इस तरह समझा जा सकता है कि यह अनुपात बताता है कि निवेशक किसी शेयर के लिए उसकी सालाना आय का कितना गुना खर्च करने के लिए तैयार हैं। सीधे शब्दों में किसी शेयर का पीई अनुपात दरअसल वर्षों की संख्या है , जिनमें शेयर का मूल्य लागत का दोगुना हो जाता है।

जैसे अगर किसी शेयर का मूल्य किसी खास समय में 100 रुपए है और उसकी आय प्रति शेयर 5 रुपए है , तो इसका मतलब यह है कि उसका पीई अनुपात 20 होगा। यानी अगर सारी परिस्थितियां समान हों तो 100 रुपए के शेयर का दाम 20 साल में दोगुना हो जाएगा। यानी उस शेयर का पीई अनुपात उस खास समय में 20 है।

किसी कंपनी के वैल्यूएशन में पीई का क्या महत्व है ?

पीई हमें केवल यह बताता है कि बाजार किसी शेयर पर कितना बुलिश या सकारात्मक है। पीई से अपने आप में कोई निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता। किसी भी नतीजे पर पहुंचने के लिए कुछ दूसरे पीई अनुपातों से इसकी तुलना जरूरी होती है। पहला , तो खुद उस कंपनी का पिछले 5-7 साल का ऐतिहासिक पीई। दूसरा , उसी के क्षेत्र में काम करने वाली दूसरी कंपनियों के पीई अनुपात और तीसरा , बेंचमार्क सूचकांक जैसे सेंसेक्स का पीई अनुपात।

किसी कंपनी का पीई बहुत ज्यादा होने से दो निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। पहला , कंपनी को उसके सही मूल्य से बहुत ज्यादा भाव मिल रहा है और इसलिए शेयर महंगा है। दूसरा , बाजार को यह पता है कि आने वाले दिनों में इस कंपनी की वृद्घि दर काफी अधिक रहने वाली है और इसलिए उसके लिए ऊंचे भाव पर भी बोली लगाई जा रही है।

ट्रेलिंग पीई और अनुमानित पीई क्या हैं ?

ट्रेलिंग पीई किसी शेयर की कीमत और पिछले 12 महीनों की उसकी आय के अनुपात को कहते हैं। इसी तरह अनुमानित पीई अगले 12 महीने की अनुमानित आय प्रति शेयर के आधार पर निकाला जाता है।

पीई से किसी शेयर की सही कीमत कैसे तय करें ?

अक्सर किसी कंपनी के लिए सारी परिस्थितियां समान नहीं होतीं। कंपनी की आय हर साल या तो बढ़ती है या घटती है। इसके अलावा कंपनी अगर एफपीओ के जरिए नए शेयर बाजार में लाती है तो उससे शेयरों की कुल संख्या में भी बढ़ोतरी होती है। इन सभी का उसकी आय प्रति शेयर पर असर पड़ता है।

अगर किसी कंपनी का ऐतिहासिक पीई पिछले पांच साल से 30 रहा हो और एकाएक बाजार की गिरावट के कारण वह 20 के पीई पर मिल रहा हो , तो वह शेयर सस्ता कहा जाएगा। लेकिन अगर वह कंपनी इंफोसिस हो जिसकी आय पर अमेरिका में संभावित मंदी के कारण असमंजस का माहौल बना हो , तो फिर एक नजर में आप 20 के पीई को सस्ता नहीं कह सकते।

बुक वैल्यू क्या है ?

बुक वैल्यू किसी भी कंपनी या वस्तु की वह कीमत होती है , जो एक खास समय पर उसे खुले बाजार में बेचने पर मिलेगी। मोटे तौर पर यह खरीद भाव में से डिप्रेशिएशन कीमत घटाकर प्राप्त हो सकती है। जैसे अगर आपने 5 लाख रुपए में एक कार खरीदी और अगर हर साल इसमें 15 फीसदी का डिप्रेशिएशन होता हो , एक साल बाद इसकी बुक वैल्यू 4.25 लाख रुपए होगी। ब्रिटेन में बुक वैल्यू को ही कंपनी का नेट असेट वैल्यू ( NAV) भी कहा जा सकता है , जिसे कुल परिसंपत्ति में से पेटेंट और साख की कीमत घटाकर प्राप्त किया जाता है।

बुक वैल्यू ऑफ इक्विटी प्रति शेयर क्या है ?

कंपनी के शेयर का जो न्यूनतम मूल्य होता है उसे बुक वैल्यू ऑफ इक्विटी प्रति शेयर कहते हैं। दूसरे शब्दों में किसी कंपनी के सामान्य शेयरों की कीमत में रिजर्व नकदी जमा को जोड़ कर और लाभांश एवं शेयर बायबैक के मद में खर्च की गई रकम को घटाकर जो मूल्य प्राप्त होता है , उसे ही बीवीपीएस कहते हैं। बीवीपीएस किसी भी शेयर के वर्तमान मूल्य का अंदाजा तो देता है , लेकिन इससे उसके भविष्य की संभावनाओं का पता नहीं चलता है। इसलिए बीवीपीएस के आधार पर किसी भी शेयर का पक्का मूल्यांकन करना सही नहीं होता।

टॉप और बॉटम क्या होते हैं?

चढ़ते हुए शेयर भाव में बार चार्ट जहां से नीचे की ओर मुड़ता है, वहां के फॉर्मेशन को टॉप या शीर्ष कहते हैं। इसी तरह गिरते हुए भाव में बार चार्ट जहां से चढ़ना शुरू कर देता है, वहीं बॉटम बन जाता है।

टेक्निकल एनालिसिस में टॉप और बॉटम का बहुत महत्व होता है। अगर किसी चार्ट में हर अगला टॉप और बॉटम क्रमश: पिछले टॉप और बॉटम से ऊंचा हो, तो शेयर या सूचकांक तेजी के दौर में माना जाता है। इसी तरह अगर किसी चार्ट में हर अगला टॉप और बॉटम क्रमश: पिछले टॉप और बॉटम से नीचे हो, तो शेयर या सूचकांक मंदी के दौर में माना जाता है।

ट्रेंड लाइन क्या है?

बार चार्ट में किसी शेयर के हर दिन के उच्चतम और न्यूनतम दामों को एक सीधी रेखा से मिलाने से जो लाइन मिलती है, उसे ट्रेंड लाइन कहते हैं। चाटिर्स्ट गिरते हुए शेयर की ट्रेंड लाइन खींचने के लिए उसके उच्चतम भाव से लाइन खींचते हैं, जबकि चढ़ते हुए शेयर की ट्रेंड लाइन खींचने के लिए न्यूनतम भाव से लाइन खींची जाती है। ज्यादा सही नतीजों के लिए किसी एक दिन के उच्चतम या न्यूनतम भाव की जगह कई दिनों के उच्चतम या न्यूनतम भावों के घनत्व वाले इलाके से लाइन खींची जाती है।

ट्रेंड लाइन ट्रेडरों का सबसे अच्छा दोस्त होता है, जिसे अंग्रेजी में 'ट्रेंड इज द बेस्ट फ्रेंड' भी कहते हैं। ट्रेंड टूटने का अर्थ होता है कि शेयर की चाल का रुख बदलने वाला है। यानी अगर शेयर भाव गिर रहा हो और एकाएक शेयर की कीमतें ऊपर से खींची गई ट्रेंड लाइन को काटकर ऊपर की ओर आने लगें, तो समझना चाहिए कि बढ़त शुरू होने वाली है। इसके उलट अगर चढ़ते हुए शेयर या इंडेक्स के निचले भाव से खींची गई ट्रेंड लाइन कीमतों के ऊपर जाने लगे, तो तेजी के सौदे काट लेने चाहिए।

स्टॉपलॉस क्या है?

स्टॉपलॉस किसी शेयर या सूचकांक की वह कीमत होती है, जिस पर पहुंचने के बाद सौदे काट दिए जाते हैं। जैसे बढ़ते हुए भाव के किसी भी चार्ट में जिस जगह भाव ट्रेंड लाइन को काट कर नीचे की ओर जाए, वहीं स्टॉपलॉस होता है। इसी तरह मंदी के सौदों में भाव जहां ट्रेंड लाइन को काटकर ऊपर आ जाए, वहीं उन सौदों का स्टॉपलॉस होता है। जब स्टॉपलॉस को भाव के साथ बढ़ाया या घटाया जाता है, तो उसे ट्रेलिंग स्टॉपलॉस कहते हैं।

क्या होते हैं वोलैटिलिटी इंडेक्स और बीटा?

बीते एक महीने के दौरान शेयर बाजारों में काफी उथल-पुथल देखने को मिली है। अप्रैल के महीने में बाजारों में देखी गई मजबूत रैली में इंट्रा-डे उथल-पुथल की कोई कमी नहीं रही। शेयर बाजारों, मुद्राओं और कमोडिटी बाजारों में दिखे हालिया चलन ने निवेशकों को भ्रमित कर दिया और ज्यादा रिटर्न पर गौर करने के बजाय लोग अब पोर्टफोलियो की सुरक्षा को अहमियत दे रहे हैं। बाजार में पल-पल बदलते हवा के रुख को उठापटक या वौलेटिलिटी कहा जाता है।

हालांकि, इस उथल-पुथल का फायदा उठाने के लिए आपको सबसे पहले यह जानना होगा कि वौलेटिलिटी होती क्या है और इसे कैसे आंका जाता है। सामान्य तौर पर जोखिम के रूप में परिभाषित की जाने वाली वौलेटिलिटी शेयर की कीमत में आने वाले बदलाव की दर होती है। वौलेटिलिटी आंकने के दो लोकप्रिय तरीके हैं। एक को वौलेटिलिटी इंडेक्स (वीआईएक्स) कहा जाता है, जबकि दूसरे को बीटा के नाम से जाना जाता है।

वौलेटिलिटी इंडेक्स

वौलेटिलिटी इंडेक्स के जरिए आंकी जाने वाली वौलेटिलिटी बाजार के संकेत देती है। अगर बाजार तेजी से उतरने या चढ़ते हैं तो वौलेटिलिटी इंडेक्स भी रफ्तार से बढ़ता है जो निवेशकों के बीच चिंता बढ़ने और बाजारों के साथ जुड़े जोखिमों को रेखांकित करने का काम करता है। जब बाजार सीमित दायरे में कारोबार करते हैं या ऊपर चढ़ने के संकेत मिलते हैं तो बाजार में हिस्सा लेने वाले लोगों का सकारात्मक रुख पुट ऑप्शन की तुलना में कॉल ऑप्शन की खरीदारी बढ़ने के रूप में दिखता है। ये वौलेटिलिटी इंडेक्स को निचले स्तरों पर रखने का काम करता है।

दूसरी ओर अगर बाजार नकारात्मक संकेतों के साथ ट्रेडिंग करता है तो पुट ऑप्शन की खरीदारी बढ़ जाती है और वौलेटिलिटी इंडेक्स ऊपरी स्तरों पर पहुंच जाता है। वौलेटिलिटी इंडेक्स के ऊपरी स्तर पर पहुंचने के मायने जोखिम बढ़ने से है। वौलेटिलिटी इंडेक्स इस बात के संकेत देता है कि ऑप्शन के ऑर्डर बुक के आधार पर छोटी अवधि में इंडेक्स कितना बदल सकता है। निफ्टी 50 ऑप्शन कीमतों पर आधारित इंडिया वीआईएक्स घरेलू बाजारों की वौलेटिलिटी आंकने का काम करता है।

बीटा

वीआईएक्स बड़े पैमाने पर बाजार का खौफ पढ़ने की कोशिश करता है, जबकि बीटा किसी शेयर विशेष में वौलेटिलिटी आंकता है। हर शेयर का बीटा इंडेक्स के मुकाबले उसके भाव में उतार-चढ़ाव की संभावना का संकेत देता है। अगर शेयर का बीटा एक से ज्यादा है तो उसे बाजार से ज्यादा जोखिमपूर्ण माना जाता है और एक से कम है तो वह बाजार की तुलना में कम जोखिम रखता है।

एक से ज्यादा बीटा होने का मतलब यह है कि जिस शेयर पर आपकी निगाह टिकी है उसमें सूचकांक के मुकाबले ज्यादा उथल-पुथल हो सकती है। एक से कम बीटा वाला शेयर, इंडेक्स से कम उठापटक की आशंका रखता है। शेयरों की बीच तुलना के लिए बीटा बढि़या जरिया है। अगर आपके पास कोई ऐसा शेयर है जो बीते एक साल के दौरान 20 फीसदी गिरा है जबकि इंडेक्स ने इसी अवधि में 35 फीसदी नुकसान उठाया है तो इसका यह मतलब हुआ कि शेयर का बीटा इंडेक्स से कम है। बीटा लंबी अवधि में नजरिया बनाने में भी मदद देता है।

दोनों तरफ काम करती है वौलेटिलिटी

यह समझना भी जरूरी है कि वौलेटिलिटी दोनों तरफ काम करती है। मसलन, उभरते हुए बाजारों के शेयरों का बीटा विकसित बाजारों की तुलना में ज्यादा होता है। 18 महीने तक उभरते हुए बाजार अमेरिकी बाजारों की तुलना में ज्यादा चढ़े हैं। बीटा का बुरा पक्ष उस वक्त सामने आया जब अमेरिकी बाजारों में गिरावट का दौर शुरू हुआ। 2009 की शुरुआत में उभरते हुए बाजारों का बीटा 1.75 है। जनवरी 2009 से उभरते हुए बाजारों ने 17 फीसदी की मजबूती देखी है जबकि ज्यादातर अमेरिकी बाजार इंडेक्स छह फीसदी चढ़े हैं।